गुरु ग्रंथ साहिब 1379 · Salok Fareed Jee · Bhagat Sheikh Fareed Ji
1ऐसे लोगों का जीना धिक्कार योग्य है, जो रब को छोड़कर पराई आशा में रहते हैं।॥२१॥
2हे फरीद ! यदि अतिथि सज्जनों से मैं कुछ छिपाकर रखूं तो
3मेरा शरीर आग के अंगारों में यूं जल जाए, ज्यों मजीठ जल जाती है।॥२२॥
4हे फरीद ! किसान बोता तो बबूल है, परन्तु मेवों को खाना चाहता है।
5यूं ही जो व्यक्ति ऊन कातता फिरता है, वह रेशमी वस्त्र को पहनने की इच्छा लगा लेता है अर्थात् जीव काम तो थोड़ा-सा करता है, लेकिन उम्मीद ज्यादा की करता है॥२३॥
6बाबा फरीद कहते हैं, गली में कीचड़ है, जिससे प्रेम लगाया हुआ है, उसका घर दूर है।
7यदि मैं उसको मिलने जाता हूँ तो बारिश के कारण मेरा कंबल भीगता है और यदि नहीं जाता तो मेरा प्रेम टूटता है॥२४॥
8मेरा कम्बल बेशक भीग कर पानी से भर जाए, अल्लाह की रजा से बरसात होती रहे,
9मैं उन सज्जनों को जाकर जरूर मिलूंगा ताकि उनसे मेरा प्रेम टूट न जाए ॥२५॥
10हे फरीद ! मुझे अपनी पगड़ी का फिक्र था कि कहीं यह मैली न हो जाए।
11परन्तु गाफिल रूह यह नहीं जानती कि आखिरकार सिर को भी मिट्टी ने ही खा जाना है॥२६॥
12फरीद जी कहते हैं कि इसमें कोई शक नहीं कि शक्कर, खांड, मिश्री, गुड़, शहद एवं भैस का दूध इत्यादि सब वस्तुएँ मीठी हैं परन्तु
13हे मेरे रब ! यह सब तेरी बराबरी नहीं कर सकती (क्योंकि तेरा नाम ही सबसे मीठा है) ॥२७ ॥
14फरीद जी कहते हैं कि मेरी रोटी लकड़ी की है, इसी से मेरी भूख दूर हो जाती है।
15जो पाप-कर्म करके घी से चुपड़ी रोटी खाएँगे, वे बहुत दुख पाएँगे ॥२८॥
16बाबा फरीद जी नेक कमाई का सादा भोजन करने की हिदायत देते हुए कहते हैं कि रूखी-सूखी दाल-रोटी खाकर ठण्डा पानी पी लो।
17हे फरीद ! पराई (अमीरों की) चुपड़ी हुई रोटी देखकर अपने दिल को मत तरसाओ ॥२६ ॥
18मैं तो केवल आज ही अपने प्रभु से दूर रही हूँ, जिससे मेरे हाथ-पैर पूरा शरीर दर्द कर रहा है।
19उन दुहागिनों से जाकर पूछो कि तुम्हारी जीवन-रात्रि कैसे गुजरी है॥३०॥
20जिस स्त्री को न ससुराल (परलोक) में आसरा मिलता है, न ही पीहर (इहलोक) में कोई स्थान मिलता है।
21पति-प्रभु उसकी बात नहीं पूछता, फिर ऐसी स्त्री यदि खुद को सुहागिन कहती है तो ठीक नहीं ॥३१ ॥
22ससुराल (परलोक) हो या पीहर (इहलोक) जीव-स्त्री तो प्रभु की ही है, वह अगम्य एवं अथाह है।
23गुरु नानक फुरमान करते हैं कि असल में वही सुहागिन है, जो प्रभु को अच्छी लगती है॥३२॥
24नहा-धोकर, खूब सज-सैंवर कर जीव-स्त्री बेफिक्र होकर मोह की नींद में सोई रही।
25पर हे फरीद ! उस स्त्री की कस्तूरी वाली गंध तो चली गई और वह हिंग की बदबू में पड़ी रही ॥३३॥
26अगर मेरी पति-प्रभु से प्रीति बनी रहे तो मुझे अपनी जवानी के जाने का भी कोई डर नहीं,
27हे फरीद ! प्रभु प्रीति के बिना कितने ही जीवों की जवानी सूख कर कुम्हला गई है॥३४॥
28फरीद जी कहते हैं कि चिंता हमारी चारपाई है, जो दुःख रूपी रस्सियों से बुनी हुई है और वियोग का दुख ही हमारा विछौना एवं रजाई है।
29हे सच्चे मालिक ! तू हमारी दशा तो देख, यही हमारा जीवन है॥ ३५ ॥
30विरह-वियोग कहकर हर कोई दुखी हो रहा है। हे वियोग ! तू ही बादशाह है,
31क्योंकि फरीद जी कहते हैं, जिस शरीर में वियोग पैदा नहीं होता, उसे शमशान के समान मानो, जहाँ नित्य आग जलती रहती है।॥३६॥
32फरीद जी कहते हैं- यह दुनिया के पदार्थ जहर से भरे हुए साग की तरह हैं, जो मोह रूपी खाण्ड में लपेट रखे हैं।
33कुछ लोग इन पदार्थों को बोते-तैयार करते ही मर गए हैं और कुछ छोड़कर चले गए॥३७ ॥
34फरीद जी कहते हैं कि हे जीव ! दिन के चार प्रहर तूने मौज-मस्ती एवं खानपान में गंवा दिए और रात के चार प्रहर सो कर गंवा दिए। (रब की बंदगी न की)
35आखिरकार रब तुझसे हिसाब मांगेगा कि केवल तुम यही काम करते रहे॥ ३८ ॥
36फरीद जी (पाप-दोषों से सावधान करते हुए) कहते हैं कि हे भाई ! तूने किसी के दरवाजे पर जाकर घड़ियाल बजता देखा है?
37जब यह बेचारा निदॉष ही मार खाता है तो फिर हम दोषियों का पता नहीं क्या हाल होगा ॥३६ ॥
38बेचारे घड़ियाल को हर घड़ी मार पड़ती है और हर प्रहर उपरांत सजा मिलती है।
39वह शरीर भी जो गुनहगार है, घड़ियाल की मानिंद अपनी उम्र रूपी रात्रि यो यूँ ही दुखों में व्यतीत करता है॥ ४० ॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं