गुरु ग्रंथ साहिब 1378 · Salok Fareed Jee · Bhagat Sheikh Fareed Ji
1दुनिया वालों की तरह मैंने भी गठरी बांधकर सिर पर उठाई हुई है, इसे छोड़कर कहाँ जाऊँ॥२ ॥
2यह दुनिया छिपी हुई आग है, जिसमें कुछ समझ नहीं आता।
3मेरे मालिक ने बहुत अच्छा किया, जो रहम करके मुझे इससे बचा लिया, अन्यथा मैंने भी इसमें जल जाना था ॥३॥
4हे फरीद ! यदि मुझे पता होता कि ये जीवन-साँसें थोड़ी हैं तो सोच-समझ कर जीवन व्यतीत करता।
5और यदि मुझे मालूम होता कि मेरा मालिक बेपरवाह है तो उसके आगे मैं बिल्कुल मान नहीं करता ॥४ ॥
6यदि मुझे मालूम होता कि प्रेम का ऑचल टूटने वाला है तो मैं मजबूत गांठ लगा देता।
7हे सच्चे मालिक ! पूरी दुनिया घूम कर देख ली है, लेकिन तेरे जैसा दूसरा कोई नहीं ॥५॥
8फरीद जी कहते हैं कि हे भाई ! यदि तू बुद्धिमान है तो अपने लिए बुरे कर्मो का हिसाब मत लिख,
9बल्कि अपने गिरेबान में सिर झुका कर देख कि तू कैसा है (अच्छे काम कर रहा है कि बुरे काम) ॥ ६ ॥
10फरीद जी नम्रता की ओर बल देते हुए कहते हैं कि यदि कोई तुझे मुक्के मारता है तो पलट कर उसे मत मार।
11बल्कि उसके पैर चूमकर अपने घर चले जाओ ॥ ७ ॥
12हे फरीद ! जब तेरा कमाई करने (अर्थात् रब का नाम जपने) का समय था तो तू दुनियाँ में ही लीन रहा।
13इस तरह मौत की नीव बढ़ती गई अर्थात् मौत निकट आती गई।जब जिंदगी पूरी हो गई तो पापों का बोझ लादकर चल पड़ा ॥८॥
14फरीद जी समझाते हैं कि हे भाई ! क्या हाल हो गया है, तेरी काली दाढ़ी भी अब सफेद हो गई है।
15आगे आने वाला मौत का समय निकट आ गया है, जिंदगी का समय भी दूर रह गया है॥ ६ ॥
16फरीद जी पुनः समझाते हैं कि देख ले, कैसी गुजर रही है। बुढ़ापे के कारण अब तो मीठी चीजें भी जहर की तरह कड़वी लगने लग गई हैं।
17अपने मालिक के बिना बुढ़ापे का दर्द किसे बताया जाए॥१० ॥
18फरीद जी बुढ़ापे का हाल बताते हुए कहते हैं कि देख-देखकर आँखें भी कमज़ोर हो गई हैं (अब आँखों से साफ नज़र नहीं आ रहा) और सुन-सुनकर कान भी बहरे हो गए हैं (बुढ़ापे के कारण सुनाई भी नहीं दे रहा)
19जवानी गुजरते ही देह रूपी खेती पक गई है और इसने दूसरा ही रंग बना लिया है॥११ ॥
20गुरु अमरदास जी फरीद जी के हवाले से कहते हैं कि जिसने जवानी में मालिक की बंदगी नहीं की, अब भला बुढ़ापे में वह कैसे बंदगी कर सकता है।
21उचित तो यही है कि खुदा से मुहब्बत करते रहो, नया ही रंग पैदा होगा ॥१२॥
22महला ३॥
23गुरु अमरदास जी बाबा फरीद जी के उपरोक्त श्लोक पर व्याख्या करते हुए कहते हैं- हे फरीद ! यदि कोई मालिक को याद करे तो सदैव कर सकता है, उसके लिए जवानी या बुढ़ापे की कोई अहमियत नहीं।
24चाहे हर कोई उसे चाहता है, परन्तु अपने लगाने से प्रेम नहीं लगता।
25यह प्रेम प्याला मालिक की बख्शिश है, जिसे चाहता है, उसे ही देता है।॥१३ ॥
26हे फरीद ! जिन सुन्दर आँखों ने लोगों को मोहित किया हुआ था, उनको भी मैंने देख लिया है।
27पहले तो वे काजल की रेखा को भी सहन नहीं करती थीं परन्तु अब उन पर पक्षियों के बच्चे बैठे हुए हैं।॥१४॥
28हे फरीद ! भले पुरुष रोज़ पुकार कर शिक्षा देते हुए समझाते हैं परन्तु
29जिन व्यक्तियों को शैतान ने खराब कर दिया है, उनका मन (अच्छे कामों की ओर) कैसे बदल सकता है॥१५ ॥
30बाबा फरीद जी समझाते हैं कि यदि तू मालिक को पाना चाहता है तो
31रास्ते की घास की तरह विनम्र हो जा,
32जिसे कोई काटता है, कोई पैरों के नीचे रोंदता है तो
33फिर वह मालिक के दर पर पहुँचती है।॥१६॥
34फरीद जी उपदेश देते हैं कि मिट्टी की निंदा मत करो, इस मिट्टी जैसा उपकारी कोई नहीं।
35यह जीते-जी पैरों के नीचे होती है और मरने के बाद ऊपर होती है।॥१७॥
36फरीद जी कहते हैं कि यदि मन में लोभ ही भरा हो तो वहाँ प्रेम कैसे हो सकता है ? लोभ में किया प्रेम झूठा ही सिद्ध होता है।
37अगर छप्पर ही टूटा हुआ हो तो बरसात के दिनों में समय कैसे गुज़र सकता है, वैसे ही लोभ में प्रेम कदापि नहीं निभ सकता ॥१८॥
38फरीद जी शिक्षा देते हुए कहते हैं कि हे भाई ! तू पेड़-पौधों को कुचलता हुआ जंगल-जंगल क्यों घूम रहा है ?
39रब तो तेरे दिल में ही बस रहा है, जंगल में क्योंकर ढूंढ रहा है॥१६॥
40फरीद जी कहते हैं- जवानी के दिनों में इन छोटी-छोटी टांगों से में मैदान एवं पहाड़ियों में घूमता फिरता रहा।
41परन्तु बुढ़ापे के कारण आज मुझे वजु करने वाला छोटा-सा लोटा भी सौ कोस दूर लग रहा है॥२०॥
42फरीद जी कहते हैं कि रातें अब लम्बी हो गई हैं, शरीर का अंग-अंग पीड़ा कर रहा है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं