गुरु ग्रंथ साहिब 1376 · Salok Kabeer Jee · Bhagat Kabeer Ji
1हाथ-पैरों से सब काम करता हूँ और इसके साथ ही मेरा मन ईश्वर की स्मृति में लीन रहता है।॥२१३॥
2महला ५॥
3गुरु अर्जुन देव जी कबीर जी के हवाले से कहते हैं, हे कबीर ! संसार में हमारा कोई नहीं है, न ही हम किसी के साथी हैं।
4जिस परमेश्वर ने सृष्टि-रचना की है, उसी में लीन होना है॥२१४ ॥
5कबीर जी उपदेश देते हैं कि जगत् रूपी कीचड़ में आटा गिरने के बाद कुछ भी नहीं मिलता।
6पीसते-पीसते जितना चबाया जाता है (अर्थात् जितना समय भक्ति-भजन में व्यतीत होता है) वही अन्त में साथ निभाता है॥२१५ ॥
7हे कबीर ! मन अच्छा-बुरा सब जानता है, परन्तु जानकर भी गुनाह करता है।
8जिसके हाथ में दीया होने के बावजूद कुंए में गिर जाए तो उसका कैसे भला होगा ॥२१६॥
9हे कबीर ! हमारी तो सज्जन प्रभु से ही प्रीति लगी हुई है परन्तु नासमझ लोग हमें उसकी आराधना से रोक रहे हैं।
10जिसने यह जीवन-प्राण दिए हैं, उससे प्रेम तोड़ने के बाद कैसे जुड़ सकता है॥ २१७ ॥
11कबीर जी उपदेश देते हैं केि लोग अपने घरों-मकानों से प्रेम करके उनको संवारने में फंसे हुए हैं।
12परन्तु मरणोपरांत साढ़े तीन हाथ अथवा ज्यादा से ज्यादा पौने चार हाथ कब्र ने ही नसीब होना है॥२१८ ॥
13कबीर जी कहते हैं कि जो में सोचता हूँ, वह परमात्मा नहीं करता, फिर भला मेरे सोचने से क्या हो सकता है।
14परमात्मा अपनी मजों से वही करता है, जो मेरे मन में याद तक नहीं होता ॥२१६ ॥
15महला ३॥
16ईश्वर स्वयं ही चिंता में डालता है और स्वयं ही जीवों को चिंतामुक्त कर देता है।
17गुरु नानक अनुरोध करते हैं कि उस मालिक की सराहना करो, जो पूरी दुनिया की देखभाल कर रहा है॥ २२० ॥
18महला ५ ॥
19पंचम गुरु कबीर जी के संदर्भ में कहते हैं-हे कबीर ! जीव परमात्मा का चिंतन नहीं करता और लोभ-लालच में भटकता फिरता है।
20पाप कर्म करते जीवनावधि पूरी हो जाती है और वह मौत को प्यारा हो जाता है॥ २२१ ॥
21कबीर जी कहते हैं कि यह शरीर कच्ची मटकी है, केवल कच्ची धातु से बना हुआ है।
22यदि इसे ठीकठाक रखना है तो राम भजन कर लो, अन्यथा इसे नाशवान ही मानो ॥ २२२ ॥
23कबीर जी समझाते हैं कि भगवान का भजन करते रहो, बेपरवाह होकर सोना नहीं चाहिए।
24रात-दिन भजन करने से कभी न कभी तो वह हमारी पुकार सुन ही लेगा ॥ २२३॥
25हे कबीर ! यह शरीर काला (घनघोर) वन समान बना हुआ है, जिसमें मन रूपी एक मदमस्त हाथी है।
26इस मस्त हाथी को काबू करने वाला ज्ञान रूपी अंकुश है, जिसे कोई विरला संत ही काबू में रखता है॥ २२४ ॥
27हे कबीर ! राम नाम रूपी बहुमूल्य पोटली को किसी पारखी के सन्मुख ही खोलो।
28इसे खरीदने के लिए कोई ग्राहक आ जाएगा तो महँगे मूल्य पर लेगा ॥ २२५॥
29हे कबीर ! व्यक्ति अपने पूरे परिवार का पालन-पोषण करता रहता है, परन्तु ईश्वर का मनन नहीं करता।
30संसारिक काम-धंधों में ही वह दम तोड़ देता है, पर किसी को पता नहीं चलता कि कब संसार छोड़ गया ॥ २२६ ॥
31कबीर जी कथन करते हैं- ऑख झपकने में ही पल-पल करके व्यक्ति की उम्र बीत जाती है।
32परन्तु फिर भी मन संसार के बन्धनों को नहीं छोड़ता, अंततः मौत का संदेश आ जाता है॥ २२७ ॥
33कबीर जी कथन करते हैं- परमात्मा वृक्ष की तरह है और वैराग्य उसका फल है।
34साधु महात्मा उस वृक्ष की छाया हैं, जिन्होंने संसार के सब वाद-विवाद छोड़ दिए हैं।॥ २२८ ॥
35कबीर जी उपदेश देते हैं कि ऐसा बीज बोओ, जिससे बारह महीने फल मिलता रहे।
36जिस वृक्ष की छाया ठण्डी एवं गहरा फल हो, पक्षी उस पर बैठकर आनंद करते रहें।॥ २२६ ॥
37हे कबीर ! दाता-परमेश्वर एक पेड़ समान है, जिसे दया का फल लगा हुआ है, वह उपकार करने वाला चिरंजीव है।
38साधुजन रूपी पक्षी अन्य देशों को चले जाते हैं और प्रार्थना करते हैं कि हे सुखमयी पेड़ ! तू सदा फलता फूलता रहे॥ २३०॥
39हे कबीर ! जिसके माथे पर उत्तम भाग्य लिखा होता है, उसे ही साधु पुरुषों की संगत प्राप्त होती है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं