गुरु ग्रंथ साहिब 1375 · Salok Kabeer Jee · Bhagat Kabeer Ji
1इस तरह मानो जैसे भट्टी में पड़कर वस्तु जलकर राख हो जाती है, सत्संग के बिना व्यक्ति कुसंगति में नष्ट हो जाता है॥१६५॥
2हे कबीर ! आकाश की निर्मल बूंद यदि भूमि में मिला ली जाए तो वह धरती से अलग नहीं की जा सकती।
3अनेकों चतुर लोग मर खप जाते हैं परन्तु शिक्षा रूपी बूंद के असर में फर्क नहीं पड़ता II १६६ II
4कबीर जी कथन करते हैं कि मैं हज्ज करने के लिए काबे में जा रहा था कि आगे मुझे खुदा मिल गया।
5वह मालिक तो मेरे साथ झगड़ा करने लग गया और उसने कहा कि यह तुझे किसने फुरमाया है कि मैं काबे में ही हूँ॥१६७ ॥
6कबीर जी कहते हैं कि मैं कई बार काबे में हज्ज करने के लिया गया परन्तु
7हे सांई ! मुझ से क्या गलती हो गई जो काबे का पीर (खुदा) मुँह से नहीं बोलता ॥१६८ ॥
8कबीर जी कहते हैं कि जो लोग बलपूर्वक जीव-हत्या करते हैं और उसको हलाल कहते हैं,
9ऐसे लोगों का तब क्या हाल होगा, जब खुदा की अदालत में कमों का हिसाब मांगा जाएगा ॥१६६ ॥
10कबीर जी कहते हैं कि किसी पर जोर-जबरदस्ती करना जुल्म है, इसका जवाब खुदा अवश्य मांगेगा।
11जब खुदा के दरबार में कर्मों का हिसाब होगा तो बुरे कर्मों की सजा अवश्य मिलेगी ॥ २०० ॥
12हे कबीर ! यदि दिल साफ हो तो हिसाब देना आसान हो जाता है।
13प्रभु के सच्चे दरबार में फिर कोई पूछताछ नहीं होती ॥२०१॥
14कबीर जी कहते हैं कि धरती और आकाश सम्पूर्ण सृष्टि में हे द्वैतभाव ! तू ही नाशरहित होकर फैली हुई है।
15छ:दर्शन-योगी, सन्यासी, वैरागी, वैष्णव इत्यादि और चौरासी सिद्ध भी संशय में पड़े हुए हैं कि द्वेतभाव से किस तरह बचा जाए॥ २०२ ॥
16कबीर जी विनयपूर्वक कहते हैं कि हे ईश्वर ! मेरा मुझ में अपना कुछ नहीं, जो कुछ है, सब तेरा ही दिया हुआ है।
17अब यदि तेरी चीज़ तुझ को सौंप ही दूँ तो मेरा कोई नुक्सान नहीं ॥२०३॥
18कबीर जी कहते हैं कि हे जगदीश्वर ! तू तू (तेरा स्तुतिगान) करता मैं तेरा ही रूप हो गया हूँ, अब मुझ में अहम् नहीं रहा।
19जब मेरा अपना-परायापन मिट गया तो जिधर देखता हूँ, वहाँ तू ही दिखाई देता है॥ २०४॥
20कबीर जी कहते हैं कि लोग पाप-विकारों को सोचते हैं और झूठी आशाओं में लीन रहते हैं।
21उनका कोई मनोरथ पूरा नहीं होता और वे जीवन से निराश ही चले जाते हैं।॥ २०५॥
22हे कबीर ! जो परमात्मा का सिमरन करता है, वही संसार में सुखी रहता है।
23जिसकी रक्षा सृजनहार करता है, वह इधर-उधर बिल्कुल नहीं डोलता ॥ २०६॥
24हे कबीर ! पापों की घानी में मुझे भी पेर दिया जाता, सतगुरु ने इससे बचा लिया है।
25पूर्व जन्म की श्रद्धा-भक्ति का फल प्राप्त हुआ है॥ २०७॥
26हे कबीर ! टालमटोल करते जिन्दगी के दिन गुजर जाते हैं और विकारों पर और विकारों का ब्याज बढ़ता जाता है।
27न परमात्मा का भजन किया, न ही किए कर्मों का हिसाब खत्म होता है और मौत सिर पर खड़ी हो जाती है॥ २०८॥
28महला ५ ॥
29पंचम गुरु, कबीर जी के संदर्भ में कहते हैं- हे कबीर ! मन रूपी कुत्ता बहुत भौंकता है और लालच में आकर हराम की चीज़ों के पीछे दौड़ता है।
30उत्तम भाग्य से सतगुरु को पा लिया है, जिसने मोह-माया से हमें बचा लिया है॥ २०६ ॥
31महला ५॥
32हे कबीर ! यदि साधु महात्मा जनों की धरती (सत्संग) पर चोर-लुटेरे बैठ भी जाएँ तो
33धरती (सत्संग) को उनके भार से कोई फर्क नहीं पड़ता, पर अच्छी संगत के कारण चोर-लुटेरे लाभ ही पाते हैं॥ २१० ॥
34महला ५॥
35गुरु जी कबीर जी के हवाले से कहते हैं- हे कबीर ! जिस प्रकार चावलों के कारण छिलकों को मूसल से पीटा जाता है।
36वैसे ही बुरी संगत में बैठने वाले भले पुरुष से भी घर्मराज पूछताछ करता है॥ २११ ॥
37त्रिलोचन भक्त अपने मित्र नामदेव जी से कहते हैं, हे मित्र ! किसलिए माया के मोह में उलझे हुए हो,
38तुम इन कपड़ों को छीवने में लगे हुए हो, अपना मन ईश्वर-भजन में क्यों नहीं लगा रहे ॥२१२ ॥
39नामदेव जी प्रत्युत्तर देते हैं- हे त्रिलोचन ! मैं अपने मुँह से परमात्मा का नाम जपता रहता हूँ
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं