सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 1374 · Salok Kabeer Jee · Bhagat Kabeer Ji

1जैसे ओला गर्मी से गल कर पानी रूप हो जाता है और ढाल पाकर बह जाता है ॥१७७॥

2हे कबीर ! ईश्वर ने पंच तत्व रूपी धूल को मिलाकर शरीर रूपी पुड़िया बांधी है।

3यह शरीर चार दिन का तमाशा है, आखिरकार शरीर रूपी मिट्टी मिट्टी में मिल जाती है।॥१७८ ॥

4हे कबीर ! सूरज चांद के उदय की तरह यह शरीर (नश्वर) है।

5गुरु-परमेश्वर के मिलाप बिना सब मिट्टी हो जाता है॥१७६ ॥

6हे कबीर ! जहाँ परम सत्य का ज्ञान होता है, वहाँ मौत का भय नहीं होता, जहाँ सांसारिक भय हो, वहाँ ईश्वर नहीं।

7कबीर जी कहते हैं कि यह बात मैंने सोच-समझ कर कही है, हे सज्जनो ! आप इसे मन लगाकर सुनो ॥१८०॥

8हे कबीर ! जिन्होंने कुछ सत्य अथवा ज्ञान को नहीं जाना, वे बेफिक्र होकर सुख की नींद सो रहे हैं।

9परन्तु जब मैंने सत्य को समझ लिया तो सब बलाएँ दूर हो गई॥१८१॥

10कबीर जी कथन करते हैं- जब दुनियावी चोटें प्राप्त होती हैं तो मनुष्य उसके दर्द से बहुत चिल्लाता है।

11परन्तु हे कबीर ! जब किसी के मर्म पर चोट लगती है तो पुकारने योग्य भी नहीं ॥१८२॥

12हे कबीर ! बरछे की चोट सुगम है, जिसके लगने पर कम से कम साँस तो ली जाती है।

13शब्द-गुरु की चोट सहना बहुत मुश्किल है, जो शब्द की चोट सहन कर ले, मैं उस गुरु का स्वयं को दास मानता हूँ॥१८३ ॥

14कबीर जी उपदेश देते हैं कि हे मुल्ला ! तू मीनार पर बांग देने के लिए क्यों चढ़ता है, बांग सुनने वाला मालिक बहरा नहीं।

15जिसके लिए तू बांग देता है, उसको तू अपने दिल में ही देख॥ १८४ ॥

16हे शेख ! यदि मन में संतोष नहीं तो हज्ज करने के लिए काबा क्योंकर जाया जाए।

17कबीर जी कहते हैं कि जिसका दिल ही साफ नहीं तो उसे कहाँ खुदा मिल सकता है।॥ १८५ ॥

18कबीर जी आग्रह करते हैं कि अल्लाह की बंदगी करो, उसे याद करने से सब दुख-दर्द मिट जाते हैं।

19वह मालिक तो दिल में ही मिल जाता है और उसके नाम से संसार की तृष्णा बुझ जाती ॥१८६॥

20कबीर जी कहते हैं कि एक तो मासूम जीव पर जोर-जबरदस्ती करके जुल्म करते हो और दूसरा इसे हलाल का नाम देते हो।

21जब खुदा के दफ्तर में तेरे कर्मों का हिसाब मांगा जाएगा तो तेरा क्या हाल होगा ॥ १८७ ॥

22कबीर जी मांस खाने पर आपति जतलाते हुए कहते हैं कि दाल-खिचड़ी का खाना बहुत अच्छा है, जिसमें स्वादिष्ट नमकीन होता है।

23जीभ के चस्के के लिए मांसाहार हेतु जीव को मारना और फिर इसकी सजा भोगने के लिए अपना गला कौन कटाए ? (मुझे यह स्वीकार नहीं) ॥१८८ ॥

24कबीर जी कहते हैं कि गुरु से साक्षात्कार तब माना जाता है, जब मोह एवं तन के रोग मिट जाते हैं।

25फिर खुशी अथवा गम कोई असर नहीं करता, तब परमात्मा स्वयं होता है।॥१८६॥

26कबीर जी कहते हैं कि राम कहने में भेद है, उस में एक समझने योग्य बात है।

27दशरथ पुत्र श्रीरामचन्द्र को सब लोग ‘राम' ही कहते हैं और सर्वव्यापक लीला करने वाले रचयिता को भी राम ही कहा जाता है॥१६० ॥

28कबीर जी कहते हैं कि ‘राम' ‘राम' जपते रहो, जपने में विवेक है।

29एक राम ही अनेकानेक रूपों में सब में समाया हुआ है, एक राम ही हर दिल में बस रहा है, वह समान रूप से एक ही है ॥१९१॥

30कबीर जी कहते हैं कि जिस घर में साधु महापुरुषों की सेवा नहीं होती, न ही ईश्वर की पूजा-वंदना होती है,

31वह घर मरघट समान है और वहाँ भूत-प्रेत ही रहते हैं।॥१६२॥

32कबीर जी कहते हैं कि वह जुबान से गूंगा व बावला हो जाता है, कान से बहरा (अर्थात् जिसके मन में गुरु का उपदेश अवस्थित हो जाता है, वह जुबान से किसी को अपशब्द नहीं कहता, कानों से किसी की निन्दा नहीं सुनता)

33व पैरों से पिंगला हो जाता है और पैरों से चलकर किसी बुरे काम के लिए नहीं जाता, जिसको सतिगुरु ने अपने शब्द का बाण मारा ॥१६३॥

34कबीर जी कहते हैं कि पूर्णगुरु ने जिसको अपने उपदेश का एक बाण मारा,

35उसके लगते ही अहम् मिट गया और दिल प्रेम में बिंध गया॥१६४॥

36हे कबीर ! वर्षा के समय आकाश से निर्मल बूंद गिरकर बेकार ही भूमि में पड़ गई और वह किसी काम न आई।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं