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गुरु ग्रंथ साहिब 1373 · Salok Kabeer Jee · Bhagat Kabeer Ji

1उस स्त्री की बराबरी नहीं कर सकती, जो प्रभु-भक्तों की सेविका है।॥१५६॥

2कबीर जी जनमानस को बताते हैं कि किसी बड़े राजा की रानी की क्यों निन्दा की जाए और संत-महात्मा की दासी को क्यों सम्मान दिया जाता है।

3इसका कारण यह है कि राजा की रानी अपनी काम पूर्ति के लिए अपनी मांग को सिंदूर से संवारती है और दासी परमात्मा का भजन करती रहती है॥१६० ॥

4हे कबीर ! शब्द-गुरु रूपी स्तंभ मिला तो मन स्थिर हो गया और सतगुरु ने धैर्य व दृढ़ निश्चय प्रदान कर दिया।

5मैंने सत्संग रूपी मानसरोवर के किनारे हरिनाम रूपी हीरा खरीदा ॥

6हे कबीर ! हरिनाम रूपी हीरे के हरि-भक्त ही जौहरी हैं, जिसे लेकर वे मन रूपी दुकान पर सजा लेते हैं।

7जब कोई अन्य पारखी (अर्थात् साधु-महात्मा) मिलता है तो ही इसकी परख अर्थात् ज्ञान चर्चा होती है॥१६२ ॥

8कबीर जी उपदेश देते हैं कि काम पड़ने पर हम तत्क्षण परमात्मा को याद करते हैं, भलाई तो इसी में है कि उसे रोज़ याद करना चाहिए।

9तब स्वर्ग में निवास करने का सुवअसर भी प्राप्त होगा और परमात्मा रूपी धन भी मिल जाएगा ॥१६३ ॥

10कबीर जी उद्बोधन करते हैं कि सेवा के लिए दो ही भले हैं, एक संत और एक राम।

11क्योंकि राम मुक्ति देने वाला है और संत मुक्तिदाता का नाम जपवाता है।॥१६४ ॥

12हे कबीर ! जिस कर्मकाण्ड रूपी मार्ग पर पण्डित चले गए हैं, उनके पीछे पूरा समाज चल पड़ा है।

13प्रभु-मार्ग की घाटी बहुत कठिन है, जिस पर कबीर चढ़ रहा है॥१६५ ॥

14कबीर जी कहते हैं- व्यक्ति दुनिया के फिक्नों (परंपरा-रीति-रिवाज) में ही मर जाता है और अपनी कुल की रीति को अपनाता है कि यदि कुल की रीति मैंने न की तो लोग क्या कहेंगे ?

15कबीर जी कहते हैं कि हे मनुष्य ! जब तेरे संबंधी तुझे श्मशान घाट चिता में जला देंगे तो फिर भला कुल की लाज कौन बचाने वाला होगा ? ॥१६६॥

16कबीर जी कहते हैं कि अरे अभागे ! लोक-लाज में तू बेकार ही डूब जाएगा।

17जो पड़ोसी के साथ हुआ है, तू इस बात को मान ले कि तेरे साथ भी वही होना है (अर्थात् मौत निश्चय है) ॥१६७ ॥

18कबीर जी समझाते हैं कि भिक्षा में मिली रोटी भली है, जिसमें कई प्रकार का अनाज होता है।

19भिखारी किसी जायदाद पर दावा नहीं करता, उसके लिए पूरा देश और बड़ा राज्य भी अपना ही प्रतीत होता है॥१६८ ॥

20कबीर जी समझाते हैं कि (जमीन-जायदाद का) दावा करने से दुख-तकलीफ ही होती है और किसी चीज़ पर दावा न करने से सुख उपलब्ध होता है।

21जो व्यक्ति निःशंक रहता है, वह इन्द्र सरीखे राजा को भी कंगाल मानता है॥१६९ ॥

22हे कबीर ! प्रभु नाम रूपी सरोवर किनारे तक भरा हुआ है, लेकिन कोई उस पानी को पी नहीं सकता।

23कबीर जी कहते हैं कि अहोभाग्य से इस नाम-जल को पा लिया है और जी भरकर पान कर रहा हूँ॥१७०॥

24कबीर जी उपदेश देते हैं कि जैसे दिन चढ़ते ही आकाश के तारे लुप्त हो जाते हैं, वैसे ही बुढ़ापे के कारण यह शरीर समाप्त हो जाता है।

25परन्तु ‘राम' नाम के दो अक्षर कभी क्षीण नहीं होते, इसलिए कबीर ने उनको मन में बसा लिया है॥१७१॥

26कबीर जी कहते हैं कि यह जगत् रूपी घर लकड़ी का है, इसकी दसों दिशाओं में मोह-माया की आग लगी हुई है।

27अपने को पण्डित मानने वाले आत्माभिमानी इसी में जलकर मर रहे हैं परन्तु नासमझ कहे जाने वाले (नम्न-सुशील) इससे बचकर निकल गए हैं।॥१७२॥

28कबीर जी उपदेश देते हैं कि मन का संशय दूर करो, धर्म ग्रंथों का पाठ छोड़ दो।

29बावन अक्षरों का सार मानकर परमात्मा के चरणों में मन लगाओ ॥ १७३॥

30कबीर जी उपदेश देते हैं कि बेशक करोड़ों ही दुष्ट-पापी मिल जाएँ परन्तु संत पुरुष अपना स्वभाव नहीं छोड़ता।

31जैसे चन्दन का पेड़ साँपों से लिपटा रहे परन्तु अपनी शीतलता नहौं छोड़ता ॥१७४ ॥

32हे कबीर ! ब्रह्म ज्ञान पा कर मन शीतल-शांत हो गया है।

33जिस माया की ज्वाला ने पूरे जगत को जला दिया है, वह सेवक के लिए पानी समान ठण्डी हो गई है॥१७५ ॥

34हे कबीर ! उस सृजनहार की लीला को कोई नहीं जानता।

35या तो इसे स्वयं वह मालिक जानता है या उसके सान्निध्य में रहने वाला भक्त ही जान सकता है॥१७६ ॥

36हे कबीर ! यह बहुत अच्छा हुआ कि परमेश्वर का भय मन में पड़ गया, जिससे संसार की दिशा सब भूल गई है।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं