गुरु ग्रंथ साहिब 1372 · Salok Kabeer Jee · Bhagat Kabeer Ji
1ज्यों-ज्यों वे भक्ति-वंदना करते हैं, त्यों-त्यों उनके मन में ईश्वर अवस्थित हो जाता है।॥१४१॥
2कबीर जी कथन करते हैं कि व्यक्ति जीवन भर अपने पुत्र-स्त्री इत्यादि परिवार में व्यस्त रहता है और राम भजन उसके गले में अटक जाता है।
3इस व्यस्तता के बीच ही यमराज के दूत लेने आ जाते हैं॥१४२ ॥
4कबीर जी उपदेश देते हैं कि मायावी पुरुष से तो सूअर ही भला है, जो विष्ठा खाकर जगह तो साफ रखता है।
5परन्तु मायावी पुरुष का मरने के बाद कोई नाम तक नहीं लेता, जिसने कितने ही कुटिल कर्म किए होते हैं।॥१४३॥
6कबीर जी कहते हैं कि व्यक्ति कौड़ी-कौड़ी (एक-एक पैसा) इकठ्ठा करके लाखों रुपए जमा कर लेता है।
7अंततः संसार से चलते वक्त उसे कुछ भी नहीं मिलता और लंगोटी तक उतार ली जाती है॥१४४ ॥
8कबीर जी कहते हैं कि चार मालाएँ गले में डालकर वैष्णव बन गया तो कौन-सी बड़ी बात है।
9क्योंकि बाहर से ही समाज के सामने शुद्ध स्वर्ण प्रतीत होते हो परन्तु मन में मैल भरी हुई है ॥१४५॥
10कबीर जी कथन करते हैं- अपने मन का अभिमान छोड़कर रास्ते का पत्थर बना रह, ताकि लोग गुजरते जाएँ।
11यदि कोई ऐसा उपकारी भक्त हो तो ही भगवान मिलता है।॥१४६॥
12कबीर जी इसी बात पर पुनः कहते हैं कि यदि रास्ते का पत्थर बन गए तो यह कौन-सी बड़ी बात है, क्योंकि वह तो मुसाफिर के पैर को चुभेगा और दुख ही प्रदान करेगा।
13परमात्मा का भक्त ऐसा (नरमदिल) होना चाहिए, ज्यों धरती पर मिट्टी होती है।॥१४७ ॥
14कबीर जी कहते हैं कि यदि धूल-मिट्टी भी बन गए तो इसमें कोई बड़ी बात नहीं, क्योंकि धूल भी उड़-उड़कर शरीर के अंगों को मलिन कर देती है।
15अतः हरि-भक्त ऐसा होना चाहिए ज्यों पानी सब में घुलमिल जाता है॥१४८ ॥
16कबीर जी सदुपदेश देते हैं कि यदि पानी की तरह बन गए तो यह भी कोई बड़ी बात नहीं क्योंकि पानी भी कभी ठण्डा और गर्म होता है।
17इसलिए हरि-भक्त ऐसा होना चाहिए जैसा हरि-रूप ही हो जाए ॥ १४६ ॥
18यदि ऊँचे घर-मकान हों, धन-दौलत एवं सुन्दर स्त्री हो, बेशक चारों ओर शोहरत फैली हो।
19इन सबके बावजूद भिक्षा की रोटी अच्छी है, जिसे लेकर संतों की संगत में प्रभु का गुणगान होता ફે ॥१५०॥
20हे कबीर ! आबाद शहर से उजाड़ इलाका कहीं अच्छा है, जहाँ परमात्मा के भक्त वंदना करते हैं।
21प्रभु-प्रेमियों के बिना जो स्थान है, वह तो मेरे लिए यमपुरी के समान है॥१५१॥
22कबीर जी कथन करते हैं कि हमने गंगा-यमुना (इड़ा-पिंगला) के भीतर शून्यावस्था में अपने आप को स्थिर कर लिया है।
23कबीर ने वहाँ पर स्थान किया है, जिस रास्ते को मुनिजन ढूंढते है ॥१५२॥
24हे कबीर ! जैसी कोमलता व मृदुलता नए पौधे में होती है, यदि ऐसी ही (भक्ति-भावना) अंत तक बनी रहे तो फिर
25एक हीरा क्या बेचारा है, उस तक करोड़ों रत्न भी नहीं पहुँच सकते॥१५३॥
26कबीर जी कहते हैं कि मैंने एक अद्भुत लीला देखी है कि हीरा दुकान पर बिकता है, परन्तु उसके पारखी जौहरी के बिना वह कौड़ियों के भाव जा रहा है।
27यह मानव जन्म एक हीरे के समान अमूल्य है, जो इसको प्रभु-भक्ति में नहीं लगाता, वह संसार के कार्यों में इसे व्यर्थ गंवा देता है ॥१५४॥
28कबीर जी उपदेश देते हैं कि जहाँ ज्ञान होता है, वहीं धर्म है, जहाँ झूठ का बोलबाला होता है, वहाँ पाप ही रहता है।
29जहाँ लोभ-लालच बना रहता है, वहाँ मृत्यु खड़ी रहती है। जहाँ दया व क्षमा-भावना है, वहाँ स्वयं परमेश्वर है॥१५५ ॥
30कबीर जी उद्बोधन करते हैं कि यदि मान-अभिमान को नहीं छोड़ा तो फिर माया को छोड़ने का भी कोई फायदा नहीं।
31इस मान ने तो बड़े-बड़े ऋषि-मुनियों को भी ध्वस्त कर दिया है, दरअसल मान सब को खा जाता है॥१५६ ॥
32कबीर जी कहते हैं कि मुझे अब सच्चा गुरु मिला तो उसने मुझे एक उपदेश का राम-बाण मारा,
33जिसके लगते ही मैं धरती से मिल गया और मेरा दिल गुरु-प्रेम में बिंध गया ॥१५७॥
34कबीर जी कहते हैं कि सच्चा गुरु भी भला क्या कर सकता है, यदि शिष्यों में खराबी-त्रुटियाँ हों।
35मुर्ख को कितनी ही शिक्षा दी जाए, यह वैसे ही है ज्यों बांस को फूंक से बजाया जाता है॥१५८ ॥
36कबीर जी उपदेश देते हैं कि हाथी, घोड़े, रथ इत्यादि सुख-सुविधाओं से सम्पन्न बड़े राजा की रानी
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं