सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 136 · Raag Maajh · Guru Arjan Dev Ji

1इस तरह काम-क्रोध मोहित नहीं करते और लालच का कूकर (कुत्ता) नाश हो जाता है।

2संसार उनकी महिमा करता है जो सद्मार्ग पर चलते हैं।

3अठसठ तीर्थ स्थानों पर स्नान करने एवं समस्त दान-पुण्य करने से प्राणियों पर दया करना अधिकतर स्वीकार्य है।

4जिस पर दया करके ईश्वर यह गुण प्रदान करता है वह बुद्धिमान पुरुष है।

5नानक उन पर बलिहारी (कुर्बान) जाता है जो अपने ईश्वर से मिल गए हैं।

6माघ महीने में वहीं पवित्र कहे जाते हैं जिन पर पूर्ण गुरदेव जी मेहरबान हैं।॥ १२॥

7फाल्गुन के महीने में केवल वही आनंद प्राप्त करते हैं, जिनके हृदय में साजन हरि प्रभु प्रकट हुआ है।

8संतजन राम से मिलन करवाने हेतु जीव की सहायता कहते हैं। प्रभु ने कृपा करके संतों से मिला दिया है।

9उसकी हृदय रूपी शैय्या बहुत सुन्दर है, अब सर्व सुख प्राप्त हुए हैं और दुखों के लिए अब कोई स्थान नहीं।

10भाग्यशाली जीव-स्त्री की इच्छा पूरी हो गई है, उसे हरि-प्रभु वर के रूप में मिल गया है।

11वह अपनी सत्संगी सखियों सहित मंगल गीत गायन करती है और वह गोविन्द का ही भजन करती रहती है।

12हरि-प्रभु समान उसे अन्य कोई दिखाई नहीं देता। उस प्रभु के समान अन्य कोई नहीं है।

13प्रभु ने उसका लोक-परलोक संवार दिया है और उसे अटल स्थान दे दिया है।

14प्रभु ने उसे भवसागर से बचा लिया है और वह पुनः जन्म-मरण के चक्र में नहीं आएगी।

15हे नानक ! मनुष्य की रसना तो एक है परन्तु प्रभु के गुण असीम हैं। मनुष्य उसके चरणों से लगकर भवसागर से पार हो जाता है।

16हे मनुष्य ! फाल्गुन के महीने में हमें सदैव उस प्रभु की महिमा-स्तुति करनी चाहिए, जिसे तिल मात्र भी अपनी महिमा करवाने की लालसा नहीं ॥ १३ ॥

17जिन-जिन प्राणियों ने भगवान का नाम-सिमरन किया है, उनके समस्त कार्य सम्पूर्ण हुए हैं।

18जो परमेश्वर स्वरूप पूर्ण गुरु का चिन्तन करते हैं, वह हरि के दरबार में सच्चे एवं शुद्ध सिद्ध हुए हैं।

19ईश्वर के चरण सर्व-सुखों का भण्डार हैं। प्रभु द्वारा मनुष्य भयानक एवं विषम संसार-सागर से पार हो जाता है।

20वे प्रेमा-भक्ति को प्राप्त होते हैं और विषय-वासनाओं में नहीं जलते।

21उनका झूठ लुप्त हो गया है और द्वैत भाव भाग गया है और वह सत्य के साथ पूर्ण तौर पर निश्चय से भरे हुए हैं।

22वह पारब्रह्म प्रभु की भरपूर सेवा करते हैं और अद्वितीय प्रभु को अपने ह्रदय में धारण करते हैं।

23सारे महीने, दिवस एवं मुहूर्त उनके लिए भले हैं जिन पर प्रभु दया-दृष्टि करता है।

24हे परमात्मा ! नानक तेरे दर्शनों के दान की याचना करता है। हे प्रभु ! अपनी कृपा उस पर न्यौछावर कीजिए॥ १४॥ १॥

25माझ महला ५ दिन रैणि

26ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।

27हे प्रभु ! मैं अपने सतिगुरु की सेवा करके समस्त दिन-रात्रि तेरी आराधना करता रहूँ।

28अपना अहंकार त्याग कर मैं ईश्वर का आश्रय ग्रहण करूं और अपने मुख से मधुर वचन उच्चारण करूँ।

29हे मेरे मित्र एवं संबंधी प्रभु ! अनेक जन्मों से मैं तुझ से बिछुड़ा हुआ हूँ, मुझे अपने साथ मिला लो।

30हे मेरी बहन ! जो प्राणी ईश्वर से बिछुड़े हुए हैं, वह सुख में नहीं बसते।

31मैंने समस्त मण्डल खोज कर देख लिए हैं। ईश्वर पति के अलावा सुख प्राप्त नहीं होता।

32क्योंकि अपने मंदे कर्मों ने ही मुझे ईश्वर से जुदा किया है। फिर मैं किस पर दोष लगाऊँ ?

33हे नाथ ! कृपा करके मेरी रक्षा करें। तेरे सिवाय अन्य कोई भी कुछ करने एवं करवाने में समर्थ नहीं।

34हे हरि ! तेरे अलावा धूल में मिलना है। दुखों के वचन किसके समक्ष व्यक्त करूँ ?

35नानक यही प्रार्थना करता है, अपने नेत्रों से मैं अपने परमात्मा के ही दर्शन करूं ॥ १॥

36जो सर्वशक्तिमान एवं अनन्त हरि है, वही प्राणी की पीड़ा को सुनता है।

37मृत्यु एवं जीवन में उसकी ही आराधना करनी चाहिए, जो सबका आधार है।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं