गुरु ग्रंथ साहिब 1369 · Salok Kabeer Jee · Bhagat Kabeer Ji
1हे कबीर ! मन पक्षी बना हुआ है, जो उड़-उड़कर दसों दिशाओं में जाता है।
2इसे जैसी संगत मिलती है, वैसा ही शुभाशुभ फल खाता है॥ ८६॥
3कबीर जी कहते हैं- जिसको ढूंढते फिर रहे थे, वही जगह पा ली है।
4जिस ईश्वर को तुम अपने से अलग मान रहे थे, उसी का रूप तुम हो गए हो ॥ ८७ ॥
5कबीर जी कहते हैं कि बुरी संगत ही मनुष्य को मारती है ज्यों केले के निकट बेरी होती है तो
6वह हवा से झूमती है, मगर केले का पेड़ उसके काँटों से चिरता है, अतः कुटिल लोगों की संगत मत करो, (अन्यथा बेकार में ही दण्ड भोगोगे) ॥ ८८ ॥
7हे कबीर ! जीव के सिर पर (निन्दा का) पराया भार चढ़ता जाता है और इसे उठाकर रास्ता तय करना चाहता है।
8परन्तु वह अपने बुरे अथवा पाप कर्मों के भार से नहीं डरता कि आगे बहुत कठिन रास्ता है ॥८९॥
9कबीर जी (पाप कर्मों की मार से बचने के लिए) सावधान करते हुए कहते हैं कि जंगल की जली हुई लकड़ी पुकार करती है कि
10कहीं मैं लोहार के हाथ में न आ जाऊँ, अन्यथा मुझे दूसरी बार कोयला बनकर जला दिया जाएगा ॥९०॥
11हे कबीर ! एक (मन) को मारने से दो (आशा-तृष्णा) मर जाते हैं।इन दोनों को मारने से चार (काम, क्रोध, लोभ, मोह) का भी अंत हो जाता है।
12चारों को मारा जाए तो छ: मरते हैं। इन छः में दो स्त्रियाँ (आशा-तृष्णा) और चार पुरुष काम, क्रोध, लोभ, मोह हैं।॥ ६१ ॥
13हे कबीर ! देख-देखकर जगत में ढूंढ लिया, लेकिन कहीं शान्ति नहीं मिली।
14जिन्होंने ईश्वर का चिंतन नहीं किया, वे अन्यत्र भटकते फिरते हैं।॥ ६२ ॥
15कबीर जी सदुपदेश देते हैं- साधु-महापुरुष की संगत करनी चाहिए, यही आखिर तक सहायता करती है।
16परन्तु कुटिल लोगों की संगत मत करो, जिससे जीवन नाश हो जाता है।॥६३॥
17कबीर जी कथन करते हैं- जिन्होंने ईश्वर को दुनिया में व्यापक मानकर उसका चिंतन किया, उनका जन्म सफल हो गया है,
18परन्तु जिन्होंने ईश्वर का भजन नहीं किया, उनका जन्म बेकार हो गया है॥ ६४ ॥
19हे कबीर ! केवल राम की आशा करो, क्योंकि अन्य आशा निराश करने वाली है।
20जो परमात्मा के नाम से विमुख रहते हैं, उनको नरक में पड़ा मानना चाहिए॥ ६५॥
21[कबीर जी दंभी गुरु-साधुओं की ओर संकेत करते हैं) कबीर जी कहते हैं कि अपने शिष्य-चेले तो बहुत बना लिए लेकिन ईश्वर को मित्र न बनाया।
22परमात्मा से मिलन का संकल्प लेकर चले थे परन्तु इनका दिल बीच रास्ते में ही (अपनी सेवा-पूजा एवं ख्याति के लिए) अटक गया ॥ ६६ ॥
23कबीर जी कहते हैं कि किसी काम को पूरा करने के लिए उसका कारण बेचारा क्या कर सकता है, यदि भगवान ही सहायता न करे।
24पेड़ की जिस डाली पर पैर रखा जाएगा, वही टूट जाएगी (ईश्वर की कृपा बिना सफलता नहीं मिलती) ॥ ६७ ॥
25हे कबीर ! जो लोग दूसरों को उपदेश देते हैं, स्वयं उस पर पालन नहीं करते, उनके मुँह में अपमान की धूल ही पड़ती है।
26ऐसे व्यक्ति दूसरों के घर की हिफाजत करते अपना घर बर्बाद कर लेते हैं।॥ ६८ ॥
27कबीर जी उद्बोधन करते हैं कि साधु-पुरुषों की संगत में रहना चाहिए, चाहे रुखा-सूखा भोजन ही नसीब हो,
28इस बात की चिंता मत करो, जो होना है वह तो होगा ही, लेकिन कुटिल लोगों की संगत कदापि न करो।॥ ६६॥
29कबीर जी उद्बोधन करते हैं कि साधु पुरुषों की संगत करने से दिन-ब-दिन ईश्वर से प्रेम में वृद्धि होती है।
30कुटिल व्यक्ति काले कंबल की तरह (दिल से काले) होते हैं, जो धोने से भी कभी सफेद नहीं होता ॥ १०० ॥
31कबीर जी कहते हैं- हे भाई ! मन को तो मुंडवाया नहीं (अर्थात् साफ नहीं किया) फिर भला सिर के बाल किसलिए मुंडवा लिए,
32क्योंकि जो कुछ भी अच्छा-बुरा करता है, वह मन ही करता है, सिर को बेकार ही मुँडवा लिया, इस बेचारे का क्या कसूर है।॥ १०१ ॥
33हे कबीर ! राम नाम नहीं छोड़ना चाहिए, यदि तन एवं धन चला जाए, नाश हो जाए, कोई परवाह मत करो।
34मन प्रभु के चरण कमल में लीन रखो, राम नाम में निमग्न रहो ॥ १०२ ॥
35हे कबीर ! हम शरीर रूपी जो बाजा बजा रहे थे, उसकी सब तारें टूट चुकी हैं।
36यह बाजा बेचारा अब क्या कर सकता है, जब बजाने वाले प्राण ही छूट गए हैं।॥ १०३ ॥
37हे कबीर ! उस गुरु की माता का सिर मूंड देना चाहिए, जिससे मन का भ्रम दूर नहीं होता।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं