सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 1368 · Salok Kabeer Jee · Bhagat Kabeer Ji

1जब मैंने देखा कि शरीर रूपी बेड़ा पुराना हो गया तो इसमें से तुरंत ही उतर गया ॥ ६७ ॥

2कबीर जी कहते हैं- पापी पुरुष को भक्ति अच्छी नहीं लगती और न ही परमात्मा की पूजा-अर्चना से लगाव होता है।

3ज्यों मक्खी चंदन को छोड़कर जहाँ दुर्गन्ध होती है, वहीं जाती है (वैसे ही पापी पुरुष भक्ति-पूजा को छोड़कर पाप कर्मों की ओर जाता है) ॥ ६८ ॥

4हे कबीर ! बेशक कोई वैद्य है, चाहे कोई रोगी है, पूरा संसार मर रहा है। (अर्थात् ज्ञानी-अज्ञानी, विद्वान या मूर्ख सब मोह-माया की मौत से मर रहे हैं)

5परन्तु एकमात्र कबीर नहीं मरा, जिसे कोई रोने वाला नहीं ॥ ६६ ॥

6कबीर जी उद्बोधन करते हैं, हे लोगो ! आपको परमात्मा का न भजन करने की बड़ी बीमारी लग गई है।

7शरीर रूपी लकड़ी की हांडी दोबारा आग पर नहीं चढ़ती अर्थात् मानव जन्म पुनः प्राप्त नहीं होता॥ ७० ॥

8हे कबीर ! ऐसी बात हो गई कि सब अपने मन की इच्छानुसार किया तो फिर

9अब मौत से क्यों डरना, जब सती होने वाली सिंदूर लगा नारियल हाथ में पकड़ लेती है तो पति के वियोग में जलने को तैयार हो जाती है।॥ ७१ ॥

10हे कबीर ! ज्यों रस के लिए गन्ने को चूसना पड़ता है तो फिर गुणों को पाने के लिए कितने ही दुख-कष्टों का सामना करना पड़े, हिम्मत करनी चाहिए।

11क्योंकि अवगुणी मनुष्य को कोई भला नहीं कहता ॥ ७२ ॥

12कबीर जी उद्योधन करते हैं- यह देह रूपी गागर श्वास रूपी जल से भरी हुई है, जिसने आज अथवा कल फूट जाना है।

13यदि अपने गुरु-परमेश्वर का स्मरण न किया तो रास्ते में ही लूट लिए जाओगे ॥ ७३ ॥

14कबीर जी कहते हैं- मैं राम का कुत्ता हूँ और मेरा नाम ‘मोती' है।

15मेरे गले में मालिक ने जंजीर डाली हुई है, वह जिधर खींचता है, उधर ही जाता हूँ॥ ७४ ॥

16कबीर जी कहते हैं कि हे भाई ! तुलसी-रुद्राक्ष की माला लोगों को क्या दिखाते हो,

17यदि दिल में परमात्मा का चिंतन नहीं किया तो इस माला का कोई फायदा नहीं ॥ ७५ ॥

18हे कबीर ! वियोग रूपी सांप जब मन को डंस लेता है तो उस पर किसी मंत्र का असर नहीं होता।

19ईश्वर-वियोग का दुख व्यक्ति को जिंदा नहीं रहने देता, परन्तु यदि वह जिंदा रहे तो बावला हो जाता है॥ ७६ ॥

20कबीर जी बतलाते हैं- पारस एवं चन्दन में एक समान गुण हैं।

21पारस को मिलकर लोहा स्वर्ण हो जाता है और चन्दन को मिलकर मामूली लकड़ी खुशबूदार हो जाती है।॥ ७७ ॥

22हे कबीर ! यम की चोट बहुत बुरी है, इसे सहन नहीं किया जाता।

23मुझे एक साधु मिल गया है, उसने शरण में लेकर बचा लिया है॥ ७८ ॥

24कबीर जी कथन करते हैं कि वैद्य लोगों को कहता है कि मैं ही उत्तम हूँ, मेरे पास हर रोग का इलाज है।

25परन्तु वह इस बात से अनजान है कि कोई (वैद्य) भी मौत के मुँह से बचा नहीं सकता, क्योंकि यह जीवन तो ईश्वर की देन है, जब चाहता है, छीन लेता है॥ ७६ ॥

26कबीर जी कहते हैं कि हे मनुष्य ! अपनी शान-शौकत का डंका दस दिन बजा लो,

27ज्यों नदिया पार करने के लिए नाव में बैठे मुसाफिरों का मेल होता है और पार उतर कर दोबारा परस्पर नहीं मिलते, वैसे ही यह जीवन दोबारा नहीं मिलता ॥ ८० ॥

28हे कबीर ! बेशक सात समुद्रों की स्याही को घोल लिया जाए, पूरी वनस्पति की कलमें बना ली जाएँ,

29पूरी पृथ्वी को ही कागज क्यों न बना लिया जाए, इसके बावजूद भी परमात्मा का यश लिखना संभव नहीं ॥ ८१॥

30कबीर जी कहते हैं- जब मेरे दिल में ईश्वर ही बस चुका है तो फिर भला जुलाहा जाति से क्या फर्क पड़ सकता है।

31हे कबीर ! राम मुझे मिल गया है, जिससे संसार के सब जंजाल दूर हो गए हैं॥ ८२ ॥

32कबीर जी कथन करते हैं- ऐसा कोई नहीं है, जो मोह रूपी घर को जला दे और

33पाँच कामादिक लड़कों को खत्म करके राम के ध्यान में लीन रहे॥ ८३ ॥

34कबीर जी कथन करते हैं कि ऐसा कोई शख्स नहीं, जो इस शरीर की वासनाओं को जला दे।

35कबीर चिल्ला-चिल्लाकर समझा रहा है परन्तु अन्धे अज्ञानी लोग इस बात को नहीं जानते ॥ ८४ ॥

36कबीर जी कहते हैं कि सती अपने मृतक पति की चिता पर कहती है, हे श्मशान ! मेरी बात सुनो,

37सब लोग इस संसार को छोड़कर चले गए हैं, अब हम तुम्हारा काम भी यही अंतकाल होना है ॥८५॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं