सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 1367 · Salok Kabeer Jee · Bhagat Kabeer Ji

1कबीर जी उद्बोधन करते हैं- (जीव रूपी) मछली थोड़े से जल में रहती है, काल रूपी मछुआरा जाल बिछाकर पकड़ लेता है।

2जीव देवी-देवताओं की अर्चना करके मौत से नहीं बच सकता, अतः समुद्र रूप परमात्मा का स्मरण करना चाहिए ॥ ४६ ॥

3कबीर जी समझाते हैं कि चाहे पानी कितना ही खारा हो (अर्थात् कितनी ही मुसीबतों का सामना करना पड़े) परमात्मा रूपी समुद्र को नहीं छोड़ना चाहिए।

4दरअसल छोटे-छोटे तालाबों (देवी-देवताओं) का आसरा ढूंढने से कोई भला नहीं होता ॥ ५० ॥

5कबीर जी कहते हैं कि निगुरे लोग संसार-समुद्र में बह गए हैं, दरअसल लंघाने वाला उनका कोई गुरु रूपी खेवट नहीं था।

6हमें अपने धर्म एवं विनम्रता में अडिग रहना चाहिए, जो परमात्मा करता है, उसे खुशी-खुशी मानना चाहिए॥ ५१ ॥

7हे कबीर ! वैष्णव की कुतिया भली एवं खुशकिस्मत है, परन्तु मायावी पुरुष की माँ बहुत बुरी है,

8क्योंकि कुतिया तो नित्य परमात्मा का यशोगान सुनती है, लेकिन माँ अपने पुत्र के पापों की कमाई में हिस्सेदार बन जाती है।॥ ५२ ॥

9हे कबीर ! जीव रूपी हिरण बहुत कमजोर है, संसार रूपी ताल विषय-विकारों के जल से हरियाला है।

10जीव तो अकेला है परन्तु उसे लाखों ही पदार्थ रूपी शिकारी फॅसाने वाले हैं, फिर यह बेचारा कब तक काल से बच सकता है ॥ ५३ ॥

11कबीर जी कथन करते हैं कि यदि गंगा के किनारे अपना घर बना लिया जाए तो रोज़ पावन जल का पान हो सकता है।

12लेकिन हरि-भक्ति के बिना मुक्ति नहीं होती, यह कहकर कबीर जी राम-राम करते चले गए ॥ ५४॥

13कबीर जी कहते हैं कि मेरा मन गंगाजल की तरह पावन हो गया है और

14कबीर -कबीर कहता प्रभु मेरे पीछे लग गया है॥ ५५ ॥

15कबीर जी कथन करते हैं- हल्दी पीली एवं चूना सफेद रंग का होता है।

16जब रंग-भेद एवं ऊँची-नीची जाति के भेदभाव को दूर कर दिया जाता है तो भक्त परमात्मा में मिलकर दोनों एक रूप हो जाते हैं ॥ ५६ ॥

17कबीर जी कथन करते हैं- हल्दी अपना पीलापन छोड़ देती है और चूने में सफेद रंग नहीं रहता।

18ऐसा प्रेम करने वालों पर मैं कुर्बान जाता हूँ, जिससे ऊँची एवं निम्न जाति, कुल एवं वर्ण का भेद मिट जाता है।॥ ५७ ॥

19कबीर जी समझाते हैं कि मुक्ति का द्वार राई के दसवें भाग के बराबर तंग है।

20मन अभिमान करके हाथी समान बड़ा हो रहा है तो फिर वह तंग रास्ते में क्योंकर निकल सकता है॥ ५८ ॥

21कबीर जी सन्मार्ग बताते हुए कहते हैं कि यदि कोई ऐसा सतिगुरु मिल जाए जो प्रसन्न होकर कृपा करे तो

22मुक्ति का द्वार खुला हो जाएगा और उस में से सुगम ही आया-जाया जा सकता है॥ ५६ ॥

23कबीर जी कहते हैं- न मेरी कोई कुटिया अथवा झोंपड़ी है, न मेरा कोई घर है और न ही रहने को गाँव है।

24यदि ईश्वर ने पूछ लिया कि तू कौन है ? तो मेरी कोई जाति एवं नाम भी नहीं फिर भला मैं क्या बताऊँगा कि कौन हूँ॥ ६० ॥

25कबीर जी कहते हैं- मुझे मरने का बहुत चाव है परन्तु मुझे ईश्वर के द्वार पर मरने की ख्वाहिश है।

26वो इसलिए शायद परमात्मा पूछ ले कि हमारे द्वार पर कौन पड़ा हुआ है॥ ६१॥

27कबीर जी कहते हैं- न मैंने कुछ (अतीत में) किया है, न ही (भविष्य में) कुछ कर सकूंगा और न ही मेरा शरीर कुछ कर सकता है।

28मैं यह भी नहीं जानता, सब परमात्मा ने ही किया, जिससे दुनिया में कबीर के नाम से मशहूर हो गया हूँ॥ ६२॥

29कबीर जी कथन करते हैं- सपने में बड़बड़ाते हुए जिस व्यक्ति के मुँह से राम नाम निकले तो

30हमारी इच्छा है कि हमारे शरीर की चमड़ी उसके पैरों की जूती बन जाए॥ ६३ ॥

31कबीर जी बतलाते हैं- हम मिट्टी के पुतले हैं और हमारा नाम मनुष्य रखा हुआ है,

32चार दिन के लिए इस संसार में मेहमान के तौर पर आए हैं लेकिन अधिकाधिक स्थानों पर कब्जा जमाने का कार्य करते हैं।॥ ६४ ॥

33कबीर जी कहते हैं- मेहंदी की तरह अपने शरीर को पीस-पीस कर (जप-तप करके) मेहनत की।

34परन्तु फिर भी हे प्रभु ! तूने हमारी बात न पूछी और न ही मेहनत करके पीसी हुई मेहंदी को कभी पैरों में लगाया ॥ ६५ ॥

35हे कबीर ! जिस दर पर आने-जाने में कोई नहीं रोकता,

36जो प्रभु का दर ऐसा हो, उस दर को कैसे छोड़ा जा सकता है॥ ६६ ॥

37कबीर जी कथन करते हैं- मैं संसार-समुद्र में डूबने ही वाला था लेकिन हरि-गुणगान की लहरों के धक्के से बच गया।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं