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गुरु ग्रंथ साहिब 1366 · Salok Kabeer Jee · Bhagat Kabeer Ji

1ऐसे मरना चाहिए कि पुनः मृत्यु प्राप्त न हो अर्थात् जन्म-मरण से मुक्ति ही मिल जाए॥ २६॥

2कबीर जी उपदेश करते हैं कि मनुष्य जन्म दुर्लभ है, यह बार-बार प्राप्त नहीं होता।

3जैसे वन में फल पक कर भूमि पर गिर जाए तो दोबारा डाली पर नहीं लगता॥ ३०॥

4कबीर जी उद्बोधन करते हैं कि तू ही कबीर है, तेरा नाम कबीर है (आत्मा-परमात्मा अभिन्न है)

5जब पहले संसारिक शरीर छोड़ा जाता है तो ही राम प्राप्त होता है॥ ३१॥

6कबीर जी उद्बोधन करते हैं- फालतू बातें नहीं करनी चाहिएँ, तुम्हारे कहने से कुछ नहीं हो सकता।

7क्योंकि ईश्वर जो कुछ कर रहा है, उसे कोई बदल नहीं सकता॥ ३२॥

8हे कबीर ! राम की कसौटी पर कोई भी झूठा व्यक्ति टिक नहीं पाता (उसका झूठ सामने आ हो जाता है)

9राम की कसौटी पर वही सच्चा सिद्ध होता है, जो मरजीवा होता है॥ ३३॥

10कबीर जी उद्बोधन करते हैं कि बेशक साफ-सुथरे कपड़े पहन लिए जाएँ, चाहे पान-सुपारी खाया जाए,

11लेकिन परमात्मा के नाम बिन तो बांधकर यमपुरी ले जाया जाता है॥ ३४॥

12हे कबीर ! जब जीवन रूपी बेड़ा टूट-फूट कर पुराना हो जाता है तो उसमें हजारों छेद हो जाते हैं।

13शुभ कर्म करने वाले हल्के (भले पुरुष) तो तैर कर किनारे लग जाते हैं परन्तु जिनके सिर पर पापों का बोझ लदा होता है, वे डूब जाते हैं।॥ ३५॥

14हे कबीर ! मनुष्य की हड़ियाँ ऐसे जलती हैं, जैसे लकड़ियाँ होती हैं और सिर के बाल घास की तरह जलते हैं।

15कबीर जी कथन करते हैं कि इस प्रकार लोगों को जलता देखकर मन उदास हो गया है॥ ३६॥

16कबीर जी कथन करते हैं- तन पर अभिमान नहीं करना चाहिए, यह तो हड़ियों पर लपेटी चमड़ी मात्र है।

17जो घोड़ों पर सवारी एवं छत्र के नीचे विराजमान थे, अंतत: वे भी धरती में गाड़ दिए गए॥ ३७॥

18कबीर जी चेताते हैं कि ऊँचा मकान देखकर अभिमान नहीं करना चाहिए, क्योंकि

19आज अथवा कल जमीन पर लेटना है और ऊपर घास उग जाएगी॥ ३८॥

20कबीर जी चेताते हैं कि अपने अमीर होने का अभिमान नहीं करना चाहिए और न ही किसी गरीब का मजाक उड़ाना चाहिए,

21क्योंकि जीवन-नैया अभी संसार-समुद्र में ही है, क्या पता पल में क्या हो जाए॥ ३६॥

22हे कबीर ! सुन्दर देह को देखकर अहंकार नहीं करना चाहिए,

23आज अथवा कल इसे छोड़ जाना है, जैसे साँप केंचुली छोड़ जाता है।॥ ४०॥

24कबीर जी उद्बोधन करते हैं- हे जीव ! अगर लूटना है तो राम नाम लूट ले, जितना हो सके लूट ले (अर्थात् परमात्मा का भजन कर ले)

25जब प्राण छूट जाएँगे तो बाद में पछतावा होगा॥ ४१॥

26हे कबीर ! ऐसा कोई माई का लाल पैदा नहीं हुआ, जिसने अपने घर (अहम्) को आग लगाई हो या

27फिर पाँच लड़कों (अर्थात् विकारों) को जलाकर परमात्मा में ध्यान लगाया हो॥ ४२॥

28क्या कोई ऐसा है, जो अपने लड़के (मोह) एवं लड़कों (आशा आकांक्षा) को बेच डाले।

29अगर है तो फिर वह कबीर के साथ हिस्सेदारी करके हरि-भजन का व्यापार कर सकता है॥ ४३॥

30कबीर जी कहते हैं कि हे मनुष्य ! यह हमारी चेतावनी है, ताकि कोई शक की गुंजायश न रह जाए।

31भूतकाल में जो भोग-विलास किए, उनका अब कोई महत्व नहीं, उसका तो गुड़ भी खाने को नहीं मिल सकता॥ ४४॥

32कबीर जी कहते हैं- (काशी में ब्राह्मणों को वेद-शास्त्र पढ़ता देखकर) पहले मैं विद्या को भला मान बैठा था और विद्या के उपरांत मैंने योग-साधना को उत्तम मान लिया।आखिरकार मेरी भक्ति में पूर्ण निष्ठा हुई।

33अब लोग भला मेरी कितनी ही निन्दा करें परन्तु मैं राम की भक्ति नहीं छोडूंगा ॥४५॥

34हे कबीर! जिनके मन में ज्ञान नहीं, बेचारे ऐसे लोगों की निन्दा से कोई फर्क नहीं पड़ता।

35क्योंकि कबीर तो अन्य सब काम छोड़कर परमात्मा का ही भजन कर रहा है॥ ४६ ॥

36हे कबीर ! जीव-परदेसी के जीवन रूपी घाघरे में चारों तरफ से आग लगी हुई है।

37शरीर रूपी गुदड़ी जलकर कोयला हो चुकी है परन्तु आत्मा रूपी सूत्र को जरा-सी आंच नहीं लगी ॥४७॥

38हे कबीर ! कफनी जलकर कोयला हो गई, जीव रूपी योगी का खप्पर भी टूट-फूट गया है।

39बेचारा जीव रूपी योगी अपना जीवन-तमाशा रचकर संसार से जा चुका है, अब तो आसन पर राख ही बची है॥ ४८ ॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं