सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 1360 · Salok Sehskritee · Guru Arjan Dev Ji

1उसी ब्राह्मण की संगत में उद्धार हो सकता है, जो ब्रह्म कर्म में पूर्ण हो।

2हे नानक ! जिसका मन संसार में लीन रहता है, ऐसा व्यक्ति निष्फल चला जाता है॥ ६५॥

3जो लोग पराया धन छीनते हैं, बहुत विध्न उत्पन्न करते हैं, अपने निर्वाह के लिए शिक्षा देते हैं, इसे ले लूं।

4जिनकी तृष्णा समाप्त नहीं होती, मन माया में लीन रहता है।ऐसे कर्म करने वाले सूअर समान हैं।॥ ६६॥

5जो व्यक्ति भगवान के चरणों में समाए रहते हैं, वे भयानक दुस्तर संसार-सागर से पार हो जाते हैं।

6गुरु नानक फुरमाते हैं- इसमें कोई शक नहीं, साधुओं की संगत में अनेकों पाप-दोष हरण हो जाते हैं।॥ ६७॥ ४॥

7महला ५ गाथा

8वह परमात्मा केवल एक (ऑकार-स्वरूप) है, सतगुरु की कृपा से प्राप्ति होती है।

9कपूर, पुष्प एवं अन्य सुगन्धियाँ मनुष्य के शरीर का स्पर्श करने से मलिन हो जाती हैं।

10गुरु नानक फुरमाते हैं- शरीर मज्जा, लहू तथा दुर्गन्ध से भरा हुआ है तो भी अज्ञानी मनुष्य इस पर अहंकार ही करता है॥ १॥

11यदि मनुष्य में इतनी समर्था हो कि वह परमाणु की तरह अणु बनकर आकाश तक सभी द्वीपों, लोकों एवं खण्डों से पल भर में भ्रमण करके ही आ जाए तो भी हे नानक ! साधुओं का संग किए बिना उसका उद्धार नहीं होता॥ २॥

12हे संसार के लोगो ! इस सच्चाई को मान लो, मृत्यु निश्चय है, जो कुछ भी दिखाई दे रहा है, सब झूठा है।

13नानक प्रार्थना करते हैं कि साधु पुरुषों के साथ परमात्मा का कीर्तिगान ही साथ चलता है॥ ३॥

14माया ने तो मन को इष्ट मित्रों एवं बन्धुओं में भटका रखा है।

15हे नानक ! सुख का स्थान केवल साधुओं के साथ परमात्मा के भजन से ही मिलता है।॥ ४॥

16चन्दन के संग रहकर नीम का वृक्ष भी चन्दन सरीखा खुशबूदार हो जाता है।

17हे नानक ! इसके विपरीत निकट रहने वाला बांस अहंकार के कारण महकदार नहीं होता॥ ५॥

18इस ‘गाथा' में ईश्वर-स्तुति गूंथी हुई है, इसका मनन करने से मान-अभिमान सब खत्म हो जाते हैं।

19हे नानक ! हरिनाम रूपी बाण के प्रहार से कामादिक पाँच शत्रुओं का अंत हो जाता है॥ ६॥

20साधुओं के वचन से भाग्यशाली लोगों को ही सुख का रास्ता प्राप्त होता है।

21हे नानक ! हरि का कीर्तन करने से जन्म-मरण के चक्र से छुटकारा हो जाता है॥ ७॥

22जैसे पेड़ के पत्र टूटकर झड़ जाते हैं और दोबारा पेड़ की शाखा के साथ नहीं लगते।

23इसी तरह हे नानक ! हरिनाम से विहीन व्यक्ति कष्ट ही भोगते हैं और दिन-रात योनियों के चक्र काटते हैं॥ ८॥

24अहोभाग्य से साधुओं की संगत में प्रभु-भक्ति प्राप्त होती है।

25हे नानक ! ईश्वर का गुणानुवाद करने से संसार-सागर का कष्ट प्रभावित नहीं करता॥ ६॥

26गहरी-अपार गाथा' को कोई विरला पुरुष ही समझता है।

27हे नानक ! वह संसार की कामनाओं को छोड़कर साधुओं के संग ईशोपासना में ही लीन रहता है॥ १०॥

28साधुओं के वचन उत्तम मंत्र हैं, जो करोड़ों दोषों का नाश कर देते हैं।

29हे नानक ! परमात्मा के चरण-कमल का ध्यान समूची वंशावलि का उद्धार कर देता है।॥ ११॥

30जहाँ परमात्मा का कीर्तिगान होता है, वास्तव में वही घर सुन्दर है।

31प्रभु का भजन करने वाले मुक्त हो जाते हैं, हे नानक ! (प्रभु-भजन) भाग्यशाली को ही प्राप्त होता है॥ १२॥

32हमें परम मित्र ईश्वर मिल गया है,

33वह कभी हमारा दिल नहीं तोड़ता।

34जिसका स्थान अतुलनीय एवं अमिट है,

35हे नानक ! उसे ही मन से साथी बना लिया है॥ १३॥

36ज्यों नेक पुत्र के कारण अपयश मिट जाता है,

37वैसे ही गुरु के उपदेश से हृदय में प्रभु का स्मरण करने से सुख-समृद्धि प्राप्त होती है।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं