गुरु ग्रंथ साहिब 135 · Raag Maajh · Guru Arjan Dev Ji
1मेरे मन एवं तन में ईश्वर के दर्शनों की अधिकतर तृष्णा है। हे मेरी जननी ! कोई संत आकर मुझे उससे मिला दे।
2मैं संतों के चरणों में लगा हूँ क्योंकि संत प्रभु से प्रेम करने वालों की सहायता करते हैं।
3परमेश्वर के बिना सुख की उपलब्धि हेतु अन्य कोई स्थान नहीं है।
4जिन्होंने प्रभु प्रेम का अमृतपान किया है, वह तृप्त एवं संतुष्ट रहते हैं।
5अपना अहंकार त्याग कर वह प्रार्थना करते हैं, 'हे ईश्वर ! हमें अपने दामन के साथ लगा लो।'
6जिन जीव-स्त्रियों को प्रभु पति ने अपने साथ मिला लिया है, वह कदापि जुदा होकर अन्य कहीं भी नहीं जाती।
7हे नानक ! भगवान की शरण लो, क्योंकि उस प्रभु के अलावा अन्य कोई भी शरण देने में समर्थ नहीं है।
8आश्विन के महीने में जिन पर परमेश्वर की दया होती है, वह बहुत सुखपूर्वक रहती हैं।॥ ८ ॥
9कार्तिक माह में हे प्राणी ! पूर्व जन्मों में किए शुभ-अशुभ कर्मों के फल भोगने ही पड़ते हैं। अत: किसी अन्य पर दोष लगाना न्यायसंगत नहीं।
10पारब्रह्म-प्रभु को विस्मृत करके मनुष्य को समस्त रोग लग जाते हैं।
11जो व्यक्ति राम से विमुख हो जाते हैं, वे जन्म-जन्म के लिए जुदा हो जाते हैं।
12जितने भी भोगने वाले पदार्थ हैं, वह एक क्षण में ही उसके लिए कड़वे हो जाते हैं।
13फिर अपने रोज के दुःख किसके समक्ष रोएँ ? जुदाई को दूर करने के लिए कोई भी मध्यस्थ नहीं बनता।
14मनुष्य के करने से कुछ भी नहीं हो सकता, यदि प्रारम्भ से ही मनुष्य की किस्मत में ऐसा संयोग लिखा हुआ था।
15सौभाग्य से मेरा प्रभु मिल जाता है तो जुदाई के समूह दुख दूर हो जाते हैं।
16नानक का कथन है कि हे मेरे प्रभु ! तू जीवों को माया के बंधनों से मुक्त करने वाला है इसलिए नानक को भी बंधनों से मुक्त कर दो।
17यदि कार्तिक के महीने में संतों की संगति हो जाए तो समस्त चिंताएँ मिट जाती हैं॥९॥
18मार्गशीर्ष महीने में जीव-स्त्रियाँ भगवान के साथ बैठी भजन करती हुई बहुत सुन्दर लगती हैं।
19उनकी शोभा वर्णन नहीं की जा सकती, जिनको ईश्वर ने अपने साथ मिला लिया है।
20अपनी सत्संगी सहेलियों के साथ सत्संग में मिलकर राम का सिमरन करने से मेरा मन एवं तन प्रफुल्लित हो गया है।
21जो जीव-स्त्रियाँ संतजनों की संगति से वंचित रहती हैं, वे पति-प्रभु से जुदा होने के कारण अकेली रहती हैं।
22उनका पति-प्रभु से जुदाई का दु:ख कभी दूर नहीं होता और वह यमदूत के पंजे में फंस जाती हैं।
23जिन्होंने अपने ईश्वर के साथ रमण किया है, वह उसकी सेवा में सदैव खड़ी दिखती हैं।
24उनका कण्ठ प्रभु-नाम रुपी रत्न-जवाहर, माणिकों तथा हीरों से जड़ित हुआ है।
25हे नानक ! वह उनके चरणों की धूलि का अभिलाषी है, जो ईश्वर के दरबार पर उसकी शरण में पड़े हैं।
26जो लोग मार्गशीर्ष महीने में ईश्वर की आराधना करते हैं, वह मुड़ कर जीवन-मृत्यु के बंधन में नहीं पड़ते और मुक्त हो जाते हैं। ॥१० ॥
27पोष के महीने में हरि-प्रभु जिस जीव-स्त्री को उसके गले से लगकर मिलता है, उसे शीत नहीं लगती।
28प्रभु के चरण-कमलों का प्रेम उसके मन को बांधकर रखता है और उसकी सुरति मालिक-प्रभु के दर्शनों में लगी रहती है।
29वह गोविन्द गोपाल का सहारा लेती हैं और अपने स्वामी की सेवा करके नाम रूपी लाभ प्राप्त करती है।
30विष रूपी माया उसे प्रभावित नहीं कर सकती और वह संतों से मिलकर भगवान की महिमा गायन करती रहती है।
31वह जिस प्रभु से उत्पन्न हुई है, उसे मिलकर उसके प्रेम में लीन रहती है।
32पारब्रह्म प्रभु ने उसका हाथ पकड़ लिया है, वह पुनः जुदा नहीं होती।
33मैं लाख बार अपने अगम्य एवं अगोचर साजन हरि पर कुर्बान जाता हूँ।
34हे नानक ! जो जीव-स्त्रियाँ नारायण के द्वार पर नतमस्तक हो गई हैं, वह उनकी लाज-प्रतिष्ठा रखता है।
35पोष महीना उसके लिए सुन्दर एवं सर्वसुख प्रदान करने वाला है, जिसको बेपरवाह परमेश्वर क्षमा कर देता है॥ ११॥
36माघ के महीने में साधुओं की चरणरज में स्नान करने को तीर्थ स्थलों के स्नान तुल्य समझो।
37भगवान के नाम का ध्यान करो एवं उसे सुनो तथा दूसरों को भी नाम का दान दो।
38नाम-सिमरन से जन्म-जन्मान्तरों की दुष्कर्मों की मलिनता दूर हो जाती है और मन का अहंकार दूर हो जाता है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं