गुरु ग्रंथ साहिब 1359 · Salok Sehskritee · Guru Arjan Dev Ji
1जिसकी शक्ति द्वारा माता के गर्भ में पालन होता है और पेट के रोग तकलीफ नहीं पहुँचाते।
2नानक का फुरमान है कि उस परमात्मा की शक्ति से संसार-सागर स्थित है, उस सागर के जल की लहरें हमें नुक्सान नहीं पहुँचाती॥ ५३॥
3परमात्मा बहुत बड़ा है, पूजनीय है और उसका सिमरन सब लोगों का जीवन है।
4नानक का जनमानस को फुरमान है कि संत पुरुषों की संगत करो, हरि-भक्ति के पावन मार्ग पर चलो, तभी उसकी लब्धि होगी॥ ५४॥
5मच्छर के समान कमजोर व्यक्ति पत्थर को तोड़कर रख दे, एक छोटी-सी चींटी कीचड़ से तैर कर पार लग जाए।
6लूला लंगड़ा व्यक्ति समुद्र को पार कर ले और अन्धा भी आँखों की रोशनी पा ले।
7ऐसा तो साधुओं की संगत में परमात्मा के सिमरन से ही संभव होता है, अतः नानक का फुरमान है कि हरि भजन में लीन रहो॥ ५५॥
8जैसे तिलक के बिना ब्राह्मण माननीय नहीं होता। जिस प्रकार अपनी अधिकार-शक्तियों के बिना राजा को कोई नहीं पूछता।
9गुरु नानक फुरमान करते हैं- जैसे अस्त्र-शस्त्रों के बिना शूरवीर (शोभा का हकदार नहीं) होता है, वैसे ही धर्म से विहीन वैष्णव व्यर्थ है॥ ५६॥
10न ही वह शंख, चक्र एवं गदा में है और न ही श्याम वर्ण है।
11उसका रूप आश्चर्य है, वह अजन्मा है।
12वेद उसे नेति नेति कहते हैं,
13अपरंपार ईश्वर बहुत बड़ा है।
14वह सिर्फ साधुओं के ह्रदय में ही बसता है, हे नानक ! इस तथ्य को भाग्यशाली ही मानते हैं।॥ ५७॥
15मनुष्य एक जंगल समान संसार में रहता है, जहाँ (लोभ, शैतान, मूर्ख रूपी) कुते, भेड़िए एवं गधे उसके संबंधी हैं।
16यह एक भयानक स्थान है, मन मोह के नशे में मस्त है, जहाँ काम, क्रोध रूपी पाँच महा असाध्य तस्कर विराजमान हैं।
17मोह, प्रेम, भय के भ्रम में लोग भटकते हैं और अहम् की फाँसी का बन्धन बहुत कठिन है।
18तृष्णाग्नि एवं वासना रूपी पानी बहुत उछल रहा है, इसके किनारे से पार होना बहुत मुश्किल है।
19संसार-सागर से पार होने के लिए बेहतर यही है कि साधु पुरुषों के साथ परमात्मा का भजन किया जाए। गुरु नानक फुरमाते हैं- प्रभु-चरणों की शरण लो, उसकी कृपा से मुक्ति निहित है॥ ५८॥
20जब परमात्मा कृपा करता है तो सब रोग नष्ट हो जाते हैं।
21नानक का फुरमान है कि साधु-पुरुषों की संगत में प्रभु का गुणगान करो, उस पूर्ण परमेश्वर की शरण लो॥ ५६॥
22मनुष्य निःसंकोच सुन्दर एवं मधुरभाषी हो, लेकिन यदि वह हृदय में वैर-भावना रखता हो तो उसका विनम्र होना झूठा है।
23अतः हे सज्जनो ! ऐसे लोगों से होशियार ही रहना॥ ६०॥
24नासमझ मूर्ख व्यक्ति यह नहीं जानता कि जीवन-साँसें प्रतिदिन घटती जा रही हैं।
25महा सुन्दर शरीर टूटता जा रहा है और काल की कन्या रूप में बुढ़ापा निगलता जा रहा है।
26तो भी व्यक्ति परिवार की लीला में लीन है, उसकी आशाओं में वृद्धि होती जा रही है और खेल-तमाशों में प्रवृत्त है।
27नानक विनती करते हैं कि अनेक जन्म भटकते-भटकते हार गए हैं, अब तो करुणामय प्रभु की शरण लो।॥ ६१॥
28हे जिह्म ! हे रसीली ! तुझे मीठी चीजें बहुत पसंद हैं।
29तूने सत्य बोलना छोड़ दिया है और झगड़ों में ही लीन हो।
30उचित तो यही है कि शुद्ध अक्षर गोविंद, दामोदर, माधव का भजन कर॥ ६२॥
31सुन्दर नारी के मोह में मनुष्य अभिमान करता है,
32बलवान पुरुष अपने बल के कारण घमण्ड करता है।
33अगर परमात्मा के चरण कमल का भजन नहीं करता तो तृण समान है और उसके जीवन को धिक्कार है।
34हे नम्रतापूर्ण चींटी ! तू बहुत मजबूत है, क्योंकि तेरे पास गोविंद सिमरन का धन है।
35नानक तुझे अनेक बार नमन करते हैं।॥ ६३॥
36एक तिनका भी पर्वत बन जाता है, सूखा स्थान हरा-भरा हो जाता है।
37डूब रहा व्यक्ति भी तैर जाता है, खाली भर जाता है।
38अंधकार में करोड़ों सूर्य का उजाला हो जाता है
39नानक विनती करते हैं कि, जब गुरु परमेश्वर दयालु हो जाता है।॥ ६४॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं