गुरु ग्रंथ साहिब 1358 · Salok Sehskritee · Guru Arjan Dev Ji
1भयानक वन सरीखा क्षेत्र भी महा नगर में बदल जाता है। ऐसे धर्म के लक्षण तो प्रभु की कृपा से प्राप्त होते हैं।
2साधुओं की शरण में राम-राम का मंत्र जपना चाहिए। हे नानक ! दयालु प्रभु के चरणों में सब संभव है॥ ४४॥
3हे (मोह )अजय महायोद्धा ! तू इतना शक्तिशाली है कि तूने बड़े-बड़े वीरों का मर्दन कर दिया है।
4गण-गंधर्व, देवता, मनुष्य एवं पशु-पक्षियों को भी मोहित कर लिया है।
5नानक का कथन है कि उस सर्वकर्ता ईश्वर को हमारा कोटि-कोटि नमस्कार है, हम उस जगदीश्वर की शरण में हैं॥ ४५॥
6हे काम ! तू जीवों को नरक में पहुँचाने वाला है और अनेक योनियों में भटकाता है।
7तू लोगों का दिल चुराने वाला है, तीनों लोकों में गमन कर रहा है, तू जप, तप, शील नष्ट करने वाला है।
8तू थोड़ा-सा सुख देने वाला है, घनहीन करने वाला, चंचल बनाने वाला और बड़े अथवा छोटे सब में लीन होता है।
9नानक का कथन है कि तेरे भय से बचने के लिए साधु पुरुषों की संगत एवं परमात्मा का आसरा ले लिया है॥ ४६॥
10हे क्रोध ! तू कलह-कलेश का मूल कारण है, तुझे तो कभी दया आती ही नहीं।
11तू विषयी जीवों को अपने वश में कर लेता है और जिस कारण वे बन्दर की तरह नाचते हैं।
12तेरी संगत में आकर भले व्यक्ति भी नीच बन जाते हैं और यमदूत उनको हुक्म देकर दण्ड पहुँचाते हैं।
13नानक का कथन है कि दोनों के दुख नाश करने वाला दयालु प्रभु ही सब जीवों की (क्रोध से) रक्षा करता है॥ ४७॥
14हे लोभ ! तूने तो बादशाह, अमीर, सब को अपने शिकंजे में डाला हुआ है और वे तेरी लहरों में फँसकर अनेक तमाशे करते हैं।
15तेरे वश में आकर जीव अनेक प्रकार से दौड़ते हैं और अनेक तरीकों से बहुत डोलते हैं।
16तुझे मित्र, इष्ट, रिश्तेदार, माता-पिता की कोई शर्म नहीं।
17तू न करने लायक भी काम करवाता है, न खाने योग्य चीज भी खिलाता है, समाज में न बनने वाली को भी बना देते हो।
18नानक प्रार्थना करते हैं कि हे नारायण ! हम तेरी शरण में आ गए हैं, इस लोभ से हर्मे बचा लो।॥ ४८॥
19हे पापी अहंकार ! तू जन्म-मरण का मूल है।
20तू मित्रों से दूर करके शत्रुओं से नाता जोड़ता है और अनेक प्रकार से माया के प्रपंच फैलाता है।
21तेरे कारण जीव आवागमन में थक जाते हैं और बहुत सुख दुख भोगते हैं।
22वे भ्रम के भयानक जंगल में रहते हैं और महा विकट एवं असाध्य रोगों का शिकार हो जाते हैं।
23नानक का कथन है कि इन रोगों का उपचार करने वाला वैद्य एकमात्र परब्रह्म परमेश्वर है, अत: उस हरि की आराधना करो॥ ४६॥
24हे प्राणनाथ ! हे गोविन्द ! हे कृपा के घर ! हे जगदगुरु !
25हे संसार के कष्ट हरण करने वाले ! हे करुणामय ! सब दुखों को दूर करो।
26हे शरण देने योग्य ! हे दयालु दीनानाथ ! कृपा करो।
27नानक विनती करते हैं कि हे प्रभु ! शरीर स्वस्थ अथवा बीमार हो, दोनों ही वक्त तेरा सिमरन करते रहें॥ ५०॥
28हे ईश्वर ! तेरे चरण-कमल की शरण में तेरा ही कीर्तन करते रहें।
29नानक का कथन है कि यदि साधु-पुरुषों की संगत की जाए तो भयानक दुस्तर महासागर से पार हुआ जा सकता है॥ ५१॥
30हे परब्रह्म ! (आशीष देकर) सिर-मस्तक का संरक्षण करो, हे परमेश्वर ! इन हाथों एवं शरीर की रक्षा करें (हम कोई बुरा काम न करें)।
31हे गोपाल ! हमारी आत्मा की रक्षा करना, धन एवं चरणों को, हे जगदीश्वर ! तू ही बचाने वाला है।
32हे दयालु गुरु ! सबकी रक्षा करना, भय-दुखों का नाश करना।
33नानक विनती करते हैं कि हे भक्तवत्सल ! अनाथों के नाथ ! हे अटल प्रभु ! हमें अपनी शरण में रखो॥ ५२॥
34जिस ऑकार ने अपनी शक्ति से आकाश को धारण किया हुआ है, लकड़ी में अग्नि को टिकाया हुआ है।
35जिसकी शक्ति से सूर्य, चन्द्रमा एवं नक्षत्रों को ज्योति मिल रही है और जिससे शरीर में प्राणों का संचार हो रहा है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं