गुरु ग्रंथ साहिब 1350 · Raag Prabhaatee · Bhagat Kabeer Ji
1हे लोगो, हे मेरे भाई ! किसी भ्रम में मत भूलो।
2यह खलक (सृष्टि) खालिक (रचनहार) ने रची है और खालिक अपनी खलकत (रचना) में ही है। सृष्टि के हर स्थान पर वही मौजूद है॥ १॥रहाउ॥
3उस बनाने वाले ने एक ही मिट्टी से अनेक प्रकार के जीवों की सृजना की है,
4न ही मिट्टी के बर्तन (मनुष्य) का कोई कसूर है और न ही बनानेवाले का कसूर है॥ २॥
5सब में एक परमेश्वर ही मौजूद है, उसका किया ही सब कुछ होता है।
6जो उसके हुक्म को मानता है, केवल उसी पर निष्ठा रखता है, वास्तव में वही नेक पुरुष कहलाता है।॥ ३॥
7अल्लाह अदृष्ट है, वह दिखाई नहीं देता। गुरु ने मुझे उस गुड़ की मिठास प्रदान की है।
8कबीर जी कहते हैं कि मेरी सारी शंका समाप्त हो गई है, मुझे तो सब में ईश्वर ही दिखाई देता है॥ ४॥ ३॥
9प्रभाती ॥
10वेदों एवं कुरान को झूठा मत कहो: दरअसल झूठा वही है जो इनका चिंतन नहीं करता।
11तुम्हारा कहना है कि सब में एक खुदा ही मौजूद है तो फिर मुर्गी कृो क्यों मार रहे हो॥ १॥
12हे मुल्ला ! मुझे बताओ, क्या यह खुदा का इंसाफ है,
13तेरे मन का भ्रम अभी दूर नहीं हुआ॥ १॥रहाउ॥
14जीव (मुर्गी) को पकड़ कर लाया, शरीर को नाश कर दिया, उसकी मिट्टी को खत्म कर दिया।
15जीव की ज्योति ईश्वर में ही मिल जाती है, फिर हलाल क्या किया॥ १॥
16वुजू किया, हाथ-मुंह धोकर पवित्र हुए तथा मस्जिद में सिर झुकाया गया,
17इन सबका क्या फायदा, जब दिल में कपट ही है तो नमाज अदा करने या हज्ज के लिए काबे में जाने का कोई लाभ नहीं॥ ३॥
18तू मन से अपवित्र है, पवित्र खुदा को नहीं समझा और न ही तूने उसके रहस्य को जाना है।
19कबीर जी कहते हैं कि इस तरह तू बहिश्त से वंचित हो गया और तेरा मन नरक में जाने के लिए तैयार हो जाता है ॥४॥४॥
20प्रभाती ॥
21हे जगत के मालिक ! हे देवाधिदेव ! हे आदिपुरुष ! शून्यावस्था में लीन होना ही तुम्हारी (प्रातः दोपहर, सायंकालीन) वंदना है।
22सिद्धों ने समाधि लगाकर तुम्हारा रहस्य नहीं पाया और वे तेरी शरण में लीन रहे हैं।॥ १॥
23हे भाई ! मायातीत ईश्वर की आरती करो, उस सतगुरु का पूजन करो।
24ब्रह्मा ने वेदों का चिंतन किया परन्तु अदृष्ट परमेश्वर के रहस्य को नहीं जान पाया॥ १॥रहाउ॥
25जब ज्ञान का तेल डालकर प्रभु के नाम की बाती का दीया प्रज्वलित किया जाता है तो देह में उजाला होता है।
26इससे ईश्वर नाम की ज्योति जगमगाती है, जिसे कोई समझदार ही समझता है॥ २॥
27प्रभु के साक्षात्कार से पाँचों शब्द एवं अनाहत ध्वनि गूंज उठी है।
28दास कबीर का कथन है कि हे निराकार ! यह तेरी आरती हैi॥ ३॥ ५॥
29प्रभाती बाणी भगत नामदेव जी की
30ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
31मन की व्यथा मन ही जानता है या उसे समझने वाले (परमेश्वर) के आगे बताया जा सकता है।
32मैं अन्तर्यामी परमात्मा की भक्ति में लीन हूँ, फिर मुझे कैसे डर हो सकता है।॥ १॥
33ईश्वर ने मुझे विंध लिया है,
34मेरा प्रभु तो हर जगह पर विद्यमान है॥ १॥रहाउ॥
35यह मन ही दुकान एवं नगर है और मन का ही प्रसार है।
36मन अनेक रंगों में रहता है और मन ही संसार में भ्रमता है॥ २॥
37यह मन जब गुरु के उपदेश में लीन हो जाता है तो स्वाभाविक ही दुविधा दूर हो जाती है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं