गुरु ग्रंथ साहिब 134 · Raag Maajh · Guru Arjan Dev Ji
1नानक की प्रभु के समक्ष प्रार्थना है कि हे प्रभु ! मुझे आकर मिलो एवं मुझे तेरे दर्शन प्राप्त होते रहें।
2वैसाख का महीना मुझे तभी सुन्दर लगता है यदि कोई हरि का संत मिल जाए॥ ३॥
3ज्येष्ठ के महीने में सिमरन द्वारा उस भगवान से जुड़ने की आवश्यकता है जिसके समक्ष जगत् के सभी जीव अपना सिर झुकाते हैं।
4जो व्यक्ति हरि-मित्र के दामन से जुड़ा हुआ है अर्थात् शरण में है, उसे यम इत्यादि कोई भी बंदी नहीं बना सकता।
5प्रभु का नाम ऐसे माणिक-मोतियों के तुल्य है, जिसे कोई भी सेंध लगाकर चुरा नहीं सकता।
6जितने भी रंग-रूप मन को प्रिय लगते हैं, वे सभी रंग नारायण के ही हैं।
7भगवान वही कुछ करता है, जो उसकी इच्छा होती है और जगत् के सभी जीव भी वही कुछ करते हैं।
8जिनको प्रभु ने अपना सेवक बनाया है, लोग उन्हें ही धन्य-धन्य कहते हैं।
9यदि मनुष्य को भगवान उसके अपने प्रयास से मिल सकता हो तो वह उनसे जुदा होकर क्यों विलाप करें?
10हे नानक ! जिन्हें संतों की संगति मिल जाती है, वे प्रभु से मिलकर आनंद भोगते हैं।
11ज्येष्ठ का महीना उसके लिए ही हर्षोल्लास वाला है, जिसे जगत् का स्वामी भगवान मिल जाता है। लेकिन भगवान उसे ही मिलता है जिसके माथे पर किस्मत के शुभ लेख होते हैं ॥ ४ ॥
12आषाढ़ का महीना, उसे ही तपता हुआ लगता है जिसके पास हरि-प्रभु नहीं है।
13जो जीव-स्त्री जगजीवन प्रभु को त्याग कर मनुष्य पर उम्मीद और विश्वास रखती है,
14वह मोह-माया में फँसकर नष्ट हो जाती है और मरणोपरांत उसके गले में यम की फाँसी डाली जाती है।
15प्राणी जिस तरह बोएगा वैसे ही काटेगा अर्थात् मनुष्य जैसा कर्म करेगा, वैसा ही फल प्राप्त होगा, जो कुछ मस्तक या भाग्य में विद्यमान है।
16जब जीव-स्त्री की जीवन-रात्रि व्यतीत हो जाती है तो वह पश्चाताप करती है और निराश होकर संसार त्याग देती है।
17जो संतों से मिलते हैं, वह प्रभु के दरबार में बन्धनमुक्त हुए शोभायमान होते हैं।
18हे प्रभु ! मुझ पर कृपा कीजिए जिससे तेरे दर्शनों की अभिलाषा हो।
19नानक की यही प्रार्थना है कि हे प्रभु ! तेरे अलावा मेरा अन्य कोई भी नहीं।
20आषाढ़ का महीना उसे ही सुहावना लगता है, जिसके ह्रदय में ईश्वर के चरणों का निवास हो जाता है।॥ ५ ॥
21श्रावण के महीने में वहीं जीव-स्त्री वनस्पति की तरह प्रफुल्लित हो जाती है, जिसका प्रभु के चरण कवलों से प्रेम है।
22उसका तन-मन सद्पुरुष के प्रेम से मग्न हो जाता है और सत्य-परमेश्वर का नाम ही उसका एकमात्र सहारा बन जाता है।
23विष-रूपी माया का मोह झूठा है। सब कुछ जो दृष्टिमान होता है, वह क्षणभंगुर है।
24हरि-नाम रुपी अमृत की बूंद बहुत सुन्दर है। संतों-गुरुओं से मिलकर मनुष्य उनका पान करता है।
25प्रभु के मिलन से सारी वनस्पति वन एवं तृण प्रफुल्लित हो गए हैं। प्रभु बेअंत एवं सब कुछ करने में समर्थ है।
26ईश्वर के मिलन हेतु मेरा हृदय बहुत व्याकुल है। परन्तु प्रभु अपनी कृपा से ही जीव को अपने साथ मिलाता है।
27जो सखियाँ ईश्वर को प्राप्त हुई हैं, उन पर मैं सदैव कुर्बान हूँ।
28नानक जी का कथन है कि हे प्रभु! मुझ पर दया करो। प्रभु अपने नाम द्वारा जीव को संवारने वाला है।
29श्रावण का महीना उन सुहागिनों के लिए ही सुन्दर है, जिन्होंने राम नाम को अपने हृदय का हार बना लिया है॥ ६॥
30भाद्रों के महीने में जो जीवात्मा पति-प्रभु को छोड़कर द्वैतभाव से प्रीति लगाती है, वह भ्रम में भटकी हुई है।
31चाहे वह लाखों ही हार-श्रृंगार कर ले परन्तु वह किसी भी लाभ के नहीं।
32जिस दिन शरीर नाश होता है, उस समय लोग उसे प्रेत कहते हैं।
33यमदूत आत्मा को पकड़ कर चल देते हैं और किसी को भी भेद नहीं बताते।
34जिनके साथ मनुष्य का बड़ा स्नेह होता है, एक क्षण में उस को त्याग कर दूर चले जाते हैं।
35जब मनुष्य की मृत्यु आती है तो वह अपने हाथ मरोड़ता है। यमदूतों को देख कर उसका शरीर कांपता है और प्राण निकलने के पश्चात् उसका शरीर काले से सफेद हो जाता है।
36मनुष्य जैसा बोता है वैसा ही काटता है अर्थात् जैसे कर्म करता है वैसा ही फल पाता है।
37हे नानक ! जो व्यक्ति प्रभु की शरण में आता है, प्रभु उसे भवसागर से पार होने के लिए चरण रूपी जहाज दे देता है अर्थात् अपने चरणों की सेवा प्रदान करता है।
38भाद्रों के महीने में जो व्यक्ति रक्षक गुरु से स्नेह करते हैं, वे नरककुण्ड में नहीं पड़ते॥ ७॥
39आश्विन के महीने में मेरे मन में प्रभु से प्रेम करने के लिए उत्साह उत्पन्न हुआ है। मैं कैसे जाकर ईश्वर से मिलू ?
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं