गुरु ग्रंथ साहिब 1348 · Raag Prabhaatee · Guru Arjan Dev Ji
1जिस व्यक्ति के मन में क्रोध एवं महा अहंकार भरा होता है,
2बेशक वह घण्टियाँ बजाकर, फूल भेंट करके अनेक प्रकार से पूजा-अर्चना कर रहा हो।
3वह नित्य स्नान करके तिलक लगाता रहे परन्तु
4उसके मन की मैल कभी दूर नहीं होती॥ १॥
5इन विधियों से कोई भी प्रभु को पा नहीं सकता।
6दिखावे के तौर पर भगवती के चिन्ह लगा लिए परन्तु मन माया में लीन रहता है॥ १॥रहाउ॥
7पहले तो मनुष्य कामादिक पाँच विकारों के वश में अनेक पाप करता है,
8तदन्तर कहता है कि तीर्थ स्नान से सब पाप धुल गए हैं।
9वह पुनः निडर होकर पाप-कर्म करने लग जाता है,
10ऐसे व्यक्ति को कलंक लगने के उपरांत यमपुरी धकेल दिया जाता है॥ २॥
11कुछ लोग पैरों में धुंघरू बांधकर ताल बजाते फिरते हैं,
12उनके मन में कपट बना रहता है और भटकते फिरते हैं।
13साँप की बॉबी को तो खत्म कर देते हैं परन्तु इससे साँप नहीं मरता।
14हे मानव ! जिस प्रभु ने तुझे पैदा किया है, वह तेरी सब करतूतें जानता है॥ ३॥
15कोई धूनी तापने लगता है, गेरुए वस्त्र धारण कर लेता है।
16मुसीबतों का मारा घर से भाग जाता है।
17वह देश छोड़कर परदेस चला जाता है।
18इन सबके बावजूद काम-क्रोध रूपी पाँच चाण्डाल साथ ही ले जाता है॥ ४॥
19कोई जीव कान फड़वाकर सन्यासी बन जाता है और लोगों से रोटी मांगने लगता है।
20वह घर-घर मांगता फिरता है लेकिन तृप्त नहीं होता।
21वह अपनी पत्नी को छोड़कर पराई नारी पर बुरी नजर डालता है।
22ऐसा सन्यासी बनकर भी भगवान नहीं मिलता, अपितु वह महादुखी होता है।॥ ५॥
23कोई मौनी बनकर बैठ जाता है और किसी से नहीं बोलता।
24परन्तु मन में वासनाओं के कारण योनियों में भटकता रहता है।
25कोई भोजन को छोड़कर शरीर को दुख पहुँचाता है।
26माया-ममत्व में लीन रहकर वह मालिक के हुक्म को नहीं समझता॥ ६॥
27सतगुरु के बिना किसी ने परमगति प्राप्त नहीं की,
28इस बारे में तो वेद एवं स्मृतियाँ भी हामी भरते हैं।
29मन-मर्जी करने वाला बेकार कर्म ही करता है,
30जिस प्रकार रेत का घर नहीं टिकता॥ ७॥
31जिस पर ईश्वर दयालु हो जाता है,
32वह गुरु के वचन को धारण कर लेता है।
33करोड़ों में से कोई विरला ही संत दिखाई देता है,
34नानक फुरमान करते हैं- जिसकी संगत में मुक्ति हो जाती है।॥ ८॥
35यदि उत्तम भाग्य हो तो ही इनका दर्शन प्राप्त होता है,
36वह स्वयं तो पार उतरता ही है, अपने पूरे परिवार को भी संसार-सागर से पार उतार लेता है॥ १॥रहाउ दूसरा॥ २॥
37प्रभाती महला ५ ॥
38परमात्मा का सिमरन करने से सब पाप-जुर्म कट जाते हैं और
39धर्मराज द्वारा बनाया गया शुभाशुभ कर्मो का हिसाब फाड़ दिया जाता है।
40जब साधु-महात्मा पुरुषों की संगत में मिलकर हरिनाम रस प्राप्त होता है तो
41हृदय में परब्रह्म समा जाता है॥ १॥
42ईश्वर का भजन करने से सच्चा सुख प्राप्त हुआ है,
43हे हरि ! तेरे भक्त तेरी चरण शरण में आए हैं।॥ १॥रहाउ॥
44मेरा आवागमन दूर हो गया है और अज्ञान का अन्धेरा मिट गया है।
45गुरु ने मुझे मुक्ति का द्वार दिखला दिया है।
46यह मन तन सदैव परमात्मा की प्रेम-भक्ति में लीन रहता है।
47जब प्रभु ने ज्ञान प्रदान किया तो ही मुझे समझ आई॥ २॥
48सृष्टि के कण-कण में परमेश्वर ही व्याप्त है,
49उसके सिवा दूसरा कोई बड़ा नहीं।
50हमारे भय-भ्रम, वैर-विरोध सब नष्ट हो गए हैं,
51पुण्यात्मा प्रभु ने अपने धर्म का पालन किया है॥ ३॥
52प्रभु ने संसार-सागर की महा लहरों से निकाल कर हमें पार लगा दिया है और
53जन्म-जन्म का टूटा हुआ रिश्ता जुड़ गया है।
54ईश्वर का सिमरन ही जप-तप एवं संयम बन गया है,
55अपने मालिक की हम पर कृपा-दृष्टि हुई है॥ ४॥
56वहाँ सुख, कल्याण एवं खुशी का माहौल बना रहता है
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं