सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 1345 · Raag Prabhaatee · Guru Nanak Dev Ji

1ईश्वर के भय में रहना ही खाना-पीना एवं सुखमय है।

2हरि-भक्त सत्संगत में संसार-सागर से मुक्त हो जाता है।

3वह सत्य बोलता है और प्रेम की भाषा ही बोलता रहता है।

4गुरु का उपदेश ही उसके लिए उत्तम कर्म है॥ ७॥

5जो व्यक्ति ईश्वर के यशोगान को अपना कर्म-धर्म, पूजा-पाठ एवं प्रतिष्ठा मानता है,

6वह काम-क्रोध को ज्ञानाग्नि में जला देता है।

7हरिनाम रस से मन आनंदित हो जाता है और

8गुरु नानक का कथन है कि अन्य कोई नहीं रहता॥ ८॥ ५॥

9प्रभाती महला १ ॥

10अन्तर्मन में दत्तचित होकर ईश्वर का नाम जपना ही सच्ची पूजा है।

11गुरु के उपदेश का चिंतन करके देख लो, एक ईश्वर के अतिरिक्त किसी दूसरे का ख्याल नहीं रहता॥ १॥

12हर जगह पर एक परमेश्वर ही मौजूद है,

13अन्य कोई दृष्टिगत नहीं होता, फिर उसके अलावा किसकी पूजा-अर्चना की जाए॥ १॥रहाउ॥

14हे परमपिता! मन, तन, प्राण सब तुझे अर्पण है,

15मेरी प्रार्थना है कि जैसे तुम्हें ठीक लगता है, वैसे ही हमें रखो॥ २॥

16यह जिव्हा हरिनाम रस में लीन होकर रसमय हो गई है।

17गुरु की शिक्षा एवं प्रभु की शरण में आने से ही मुक्ति होती है॥ ३॥

18मेरे प्रभु ने कर्म धर्म बनाए हैं लेकिन

19हरिनाम की बड़ाई को सर्वोत्तम कर्म बनाया है॥ ४॥

20काम, अर्थ, धर्म एवं मोक्ष सतिगुरु के वश में हैं,

21तीन तो यही समा जाते हैं और चौथा (मोक्ष) कृतार्थ कर देता है॥ ५॥

22सतिगुरु जीव को मुक्ति प्रदान करता है और परमात्मा के ध्यान में लगाता है।

23इस प्रकार हरिपद को जानकर जीव प्रतिष्ठा प्राप्त करते हैं।॥ ६॥

24गुरु के समझाने से मन तन शीतल हो जाता है।

25जिन्हें प्रभु शोभा प्रदान करता है, उनकी महता कौन प्राप्त कर सकता है॥ ७॥

26गुरु नानक फुरमाते हैं कि गुरु ने उपदेश देते हुए यही समझाया है कि

27हरिनाम के बिना किसी ने मुक्ति प्राप्त नहीं की।॥ ८॥ ६॥

28प्रभाती महला १ ॥

29पूर्णगुरु ने ऐसी रीति बनाई है कि कुछ लोगों को प्रारम्भ से ही कृपा करके बचा लिया है।

30वे सदैव ईश्वर की भक्ति में लीन रहते हैं, उनके दुख-दर्द समाप्त हो जाते हैं और वे इज्जत प्राप्त करते हैं।॥ १॥

31दुर्मति की चतुराई झूठी है,

32जिसे नाश होते कोई समय नहीं लगता॥ १॥रहाउ॥

33स्वेच्छाचारी को दुख दर्द सताते रहते हैं, उसके दुखों का अन्त नहीं होता।

34जीव जब गुरु द्वारा सुख दुख देने वाले मालिक को जान लेता है तो वह शरण में लेकर उसे मिला लेता है॥ २॥

35स्वेच्छाचारी से भगवान की भक्ति नहीं हो पाती, वह अहंकार में लीन रहकर बावला बना रहता है।

36यह मन जब तक प्रभु-शब्द को नहीं जानता, तब तक आकाश पाताल में ही भटकता है॥ ३॥

37दुनिया भूख प्यास की शिकार बनी हुई है और सच्चे गुरु के बिना इसकी तृप्ति नहीं होती।

38जिसे सहज स्वाभाविक शान्ति मिलती है, वही सुख पाता है और प्रभु के दरबार में सम्मान का हकदार बनता है।॥ ४॥

39गुरु की निर्मल वाणी से ज्ञान प्राप्त होता है कि केवल परमात्मा ही बुद्धिमान है।

40वह स्वयं' ध्यानपूर्वक सुनने वाला एवं चिंतनशील है और स्वयं निर्वाणपद को बूझता है॥ ५॥

41उसने जल की तरंगों, अग्नि, पवन तीनों को मिलाकर जगत को उत्पन्न किया है।

42उसने जगत की चीजों में ऐसा बल-छल प्रदान किया है कि सब उसके हुक्म में बंधे हुए हैं।॥ ६॥

43संसार में ऐसे विरले ही व्यक्ति हैं, और उनकी परख करके खजाने में डाल दिया जाता है

44जो जाति-पाति, वर्ण, वासनाओं, मोह-ममता एवं लोभ से दूर रहते हैं।७॥

45वही लोग निर्मल होते हैं, जो प्रभु-नाम रूपी तीर्थ में स्नान करते हैं, उनका दुख, अभिमान एवं पापों की मैल दूर हो जाती है।

46गुरु नानक का फुरमान है कि उन महापुरुषों के चरण धोना हमारा अहोभाग्य है, जिनको ईश्वर प्यारा लगता है॥ ८॥ ७॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं