सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 1342 · Raag Prabhaatee

1प्रभाती असटपदीआ महला १ बिभास

2ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

3बावली दुविधा ने इस मन को भी बावला बना दिया है।

4झूठे लालच में फँसकर अमूल्य जीवन गंवा दिया है।

5यह इस प्रकार जीव से लिपट रही है कि इसे पुनः रोका नहीं जा रहा।

6सच्चा गुरु ही प्रभु के नाम का जाप करवा कर इससे बचाता है॥ १॥

7न ही मन की वासनाएँ मिटती हैं और न ही माया का मोह समाप्त होता है।

8जिसने कुछ प्राप्त किया है, वही जानता है, शब्द के चिंतन द्वारा वह भयानक संसार-सागर से पार उतर जाता है॥ १॥रहाउ॥

9माया संचित करके राजा अहंकारी बन जाते हैं,

10परन्तु प्यारी माया उनका साथ नहीं देती।

11माया-ममता अनेक रंग दिखाती है,

12पर परमात्मा के नाम बिना कोई साथ नहीं देता॥ २॥

13मन जिस प्रकार ,किसी को देखता है, उसे वैसा ही दूसरे का मन लगता है।

14जैसी कामना होती है, वैसी दशा हो जाती है।

15वह जैसे कर्म करता है, वैसी ही लगन लग जाती है।

16गुरु के उपदेश का पालन करने से सहजावस्था प्राप्त होती है॥ ३॥

17राग-संगीत में लीन मन द्वैतभाव में लिप्त रहता है।

18मन में छल-कपट की वजह से मनुष्य महा दुख प्राप्त करता है।

19जब सतगुरु से भेंट होती है तो ही ज्ञान प्राप्त होता है,

20फिर परमात्मा के नाम में ध्यान लगा रहता है।॥ ४॥

21वह गुरु के सच्चे उपदेश से सत्कर्म करता है और

22शुद्ध वाणी से परमात्मा का गुणानुवाद करता है।

23वह अपने सच्चे घर में रहकर अमर पदवी पा लेता है।

24इस तरह प्रभु के द्वार पर शोभा प्राप्त करता है॥ ५॥

25गुरु की सेवा बिना भक्ति नहीं होती

26बेशक कोई अनेय यत्न कर ले ।

27जब गुरु के वचन से अहम्-भाव दूर होता है तो

28मन में निर्मल नाम बस जाता है।॥ ६॥

29इस दुनिया में ब्रह्म-शब्द ही श्रेष्ठ प्राप्ति है।

30प्रभु-शब्द के बिना सब मोह एवं अंधकार है और

31शब्द से ही नाम हृदय में धारण होता है।

32शब्द की इतनी महता है कि इससे मुक्ति प्राप्त होती है।॥ ७॥

33भगवान के बिना अन्य कोई भी नहीं है, जो रचना करके पोषण करने वाला हो।

34वह सत्यस्वरूप, अनुपम एवं अपार है।

35गुरु नानक उपदेश करते हैं- राम नाम के स्मरण से ही उतम गति होती है,

36कोई भी जिज्ञासु खोज कर पा लेता है ॥८॥१॥

37प्रभाती महला १ ॥

38पूरे संसार में माया का मोह फैला हुआ है।

39सुन्दर युवती को देखकर कामपिपासु उस पर लुब्ध हो जाता है।

40जीव ने अपने पुत्र एवं धन-दौलत से प्रेम लगाया हुआ है।

41सब चीजों को तो वह अपना मानता है, लेकिन एक परमेश्वर ही उसके लिए पराया बना हुआ है॥ १॥

42माला लेकर ऐसा जाप करो कि

43दुख सुख से रहित होकर भक्ति में लीन हो जाओ॥ १॥रहाउ॥

44हे गुणों के खजाने ! तेरा रहस्य कोई नहीं पा सकता,

45सच्चे शब्द द्वारा ही जीव तुझ में लीन होता है।

46जन्म-मरण तूने स्वयं ही बनाया है।

47वही परम भक्त है, जिसने परमात्मा में मन लगाया है॥ २॥

48ईश्वर के ज्ञान ध्यान को

49सतगुरु के साक्षात्कार के बिना कोई नहीं जान सकता।

50सबके अन्तर्मन में उसी की ज्योति फैली हुई है,

51मैं उस आनंदरूप प्रभु पर सदा कुर्बान जाता हूँ॥ ३॥

52गुरु की शिक्षा से ही भाव-भक्ति प्राप्त होती है और

53शब्द से मन का अहंकार जल जाता है।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं