गुरु ग्रंथ साहिब 1336 · Raag Prabhaatee · Guru Raam Daas Ji
1जिसने गुरु से एक पल हरिनाम अमृत का पान किया है, उसके गुण गाने एवं सुनने वाले दोनों मुक्त हो जाते हैं।॥ १॥
2हे मेरे मन ! परमात्मा के भजन में लीन रहो,
3गुरु से हमने हरिनाम रूपी शीतल जल प्राप्त किया है और आनंदपूर्वक हरिनाम रस का पान किया है॥ १॥रहाउ॥
4जिन्होंने हृदय में परमात्मा से प्रेम लगाया है, उनका जीवन सफल हो गया है।
5समूचे जगत में हरि-भक्तो की यों शोभा होती है, जैसे सितारों में चांद शोभा देता है।॥ २॥
6जिन लोगों के दिल में प्रभु का नाम नहीं बसता, उनके सभी कार्य असफल होते हैं।
7नामविहीन मनुष्य इस तरह है, जैसे श्रृंगार करने के बावजूद नाक कटने पर नकटा कहलाता है॥ ३॥
8सबमें एक परमेश्वर ही व्याप्त है, वह घट घट में विद्यमान है।
9दास नानक पर ईश्वर की कृपा हुई है और गुरु के वचनों से वह हरिनाम ध्यान में ही लीन रहता है।४॥ ३॥
10प्रभाती महला ४ ॥
11मन-वाणी से परे, दयासागर प्रभु ने कृपा की तो हम हरिनाम का भजन करने लग गए।
12हरिनाम पापियों को पावन करने वाला है, उसका ध्यान करने से सब पाप-अपराध दूर हो गए हैं॥ १॥
13हे मन ! ईश्वर का जाप करो,
14वह सर्वव्यापक है, वह दीनों पर दया करने वाला है, दुखों को नाश करने वाला है, अतः उसी का स्तुतिगान करो।
15गुरु की शिक्षा द्वारा हरिनाम पदार्थ प्राप्त होता है॥ १॥रहाउ॥
16शरीर रूपी नगरी में परमेश्वर ही बसा हुआ है और गुरु की शिक्षा से उसके दर्शन होते हैं।
17शरीर रूपी सरोवर में ही हरिनाम प्रगट होता है और हृदय घर में प्रभु की प्राप्ति हो जाती है॥ २॥
18जो व्यक्ति जंगलों में भटकता फिरता है दरअसल ऐसा मायावी मूर्ख लुट जाता है, जैसे मृग के अन्दर सुगन्धि होती है, परन्तु वह झाड़ियों में भ्रमता फिरता है॥ ३॥
19हे प्रभु ! तुम बहुत बड़े, अगम्य, असीम एवं ज्ञानवान हो, ऐसा उपदेश प्रदान करो कि तुझे पा लें।
20सेवक नानक को गुरु का आशीर्वाद प्राप्त हुआ तो वह हरिनाम में लीन हो गया।॥ ४॥ ४॥
21प्रभाती महला ४ ॥
22मन में हरिनाम से प्रीति लगी तो सच्चिदानंद सर्वेश्वर प्रभु का जाप किया।
23प्रभु की कृपा हुई तो सतगुरु के वचन हृदय में सुख प्रदान करने लगे॥ १॥
24हे मेरे मन ! पल भर के लिए परमात्मा का भजन कर लो;
25पूर्णगुरु ने हरिनाम का दान प्रदान किया है और यह मन तन में अवस्थित हो गया है।॥ १॥रहाउ॥
26शरीर रूपी नगरी एवं हृदय-घर में ईश्वर ही बसा हुआ है और गुरु द्वारा जाप करके उसकी शोभा मालूम हुई है।
27गुरु के द्वारा यश प्राप्त होता है और लोक-परलोक में जीव सुख पाता है॥ २॥
28हमारी तो निर्भय परमात्मा में लगन लगी हुई है, गुरु की कृपा से प्रभु को मन में धारण कर लिया है।
29दया की मूर्ति परमात्मा ने भक्तों के करोड़ों पाप-दोष एक पल में दूर कर दिए हैं।॥ ३॥
30हे प्रभु ! तुम्हारे भक्त तुम्हारी भक्ति से विख्यात होते हैं और तेरी कीर्ति भी भक्तों द्वारा ही है।
31नानक का फुरमान है कि हरिभक्त परमात्मा का रूप हैं और भक्त एवं परमात्मा अभिन्न हैं।॥ ४॥ ५॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं