सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 1335 · Raag Prabhaatee · Guru Amar Daas Ji

1जो पूर्ण भाग्यशाली होता है, वह सदा परमात्मा के गुण गाता है।॥ १॥रहाउ॥

2ईश्वर नामामृत रूपी भोजन देता है,

3जिसे करोड़ों में से कोई विरला पुरुष ही पाता है और

4जिस पर अपनी कृपा-दृष्टि करता है॥ १॥

5गुरु के चरण मन में बसाने से

6दुख का अंधेरा दूर हो जाता है और

7ईश्वर स्वयं ही अपने साथ मिला लेता है॥ २॥

8गुरु की वाणी से प्रेम लगाओ,

9लोक-परलोक का यही आसरा है और

10वह स्रष्टा स्वयं ही प्रेम देता है॥ ३॥

11ईश्वर अपनी रज़ा मनवाता है,

12उसकी रज़ा को मानने वाला भक्त बुद्धिमान एवं समझदार है और

13नानक तो उस पर सदैव कुर्बान है॥ ४॥ ७॥ १७॥ ७॥ २४॥

14प्रभाती महला ४ बिभास

15ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

16गुरु की शिक्षा द्वारा मज़े लेकर परमात्मा का गुणगान किया है और सहजावस्था में दत्तचित होकर हरिनाम में लगन लगी हुई है।

17गुरु के उपदेश से हरिनामामृत का रस पान किया है और हम हरिनाम पर कुर्बान हैं।॥ १॥

18संसार का जीवन प्रभु ही हमारे प्राण हैं।

19गुरु ने जब कानों में मंत्र दिया तो हृदय में ईश्वर ही प्यारा लगने लगा॥ १॥रहाउ॥

20हे मेरे भाई, संतजनो ! आओ हम मिलकर हरिनाम की प्रशंसा करें।

21मुझे उपदेश प्रदान करो कि मैं अपने प्रभु को किस तरह पा सकता हूँ॥ २॥

22ईश्वर सत्संगत में बसा हुआ है, अतः संगत में मिलकर ईश्वर के गुणों को समझ लो।

23उत्तम भाग्य से गुरु की सत्संगत प्राप्त होती है और गुरु के चरण-स्पर्श से भगवान से मिलाप होता है॥ ३॥

24हम प्रभु का गुणानुवाद करते हैं, उस मालिक के गुण गाकर विस्मित हो रहे हैं।

25नानक का कथन है कि गुरु ने कृपा करके हमें हरिनाम भजन का दान दिया है।॥ ४॥ १॥

26प्रभाती महला ४ ॥

27सुबह होते ही गुरुमुख-जन ईश्वर का भजन करते हैं और रात्रिकाल भी ईश्वर की स्मृति में लीन रहते हैं।

28प्रभु ने हमारे अन्तर्मन में ऐसी आकांक्षा उत्पन्न कर दी है कि हम उसी की खोज करते रहते हैं।॥ १॥

29मेरा मन तो साधु-पुरुषों की चरण-धूल ही चाहता है।

30गुरु ने हरिनाम का जाप करवाया है और मैं अपने बालों से गुरु के पैर साफ करता हूँ॥ १॥रहाउ॥

31निरीश्वरवादी दिन-रात मोह के अंधकार एवं माया के जाल में फंसा रहता है।

32उसके हृदय में पल भर भी प्रभु नहीं बसता, उसका बाल-बाल कर्ज में फंसा होता है।॥ २॥

33सत्संगति में मिलने से उत्तम बुद्धि प्राप्त होती है और मोह-ममता के जाल से छुटकारा हो जाता है।

34मुझे तो हरिनाम ही मधुर लगता है और गुरु ने उपदेश देकर निहाल कर दिया है।॥ ३॥

35हम जीव तो बच्चे हैं, गुरु संसार का स्वामी है और वह कृपा करके हमारा पालन-पोषण करता है।

36नानक विनती करते हैं कि हे गुरु परमेश्वर ! इस विषम संसार सागर में डूबने से बचा लो, हम तुम्हारे बच्चे हैं।॥ ४॥ २॥

37प्रभाती महला ४ ॥

38जब प्रभु ने एक क्षण अपनी कृपा की तो हम प्रेमपूर्वक उसी के गुण गाने लग गए।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं