गुरु ग्रंथ साहिब 1334 · Raag Prabhaatee · Guru Amar Daas Ji
1हे प्रभु ! तू स्वयं कृपा करके बचाता है और यमराज भी उनके पास नहीं फटकता॥ २॥
2हे श्रीहरि ! तेरी शरण शाश्वत है, न यह कम होती है, न ही नष्ट होती है।
3जो भगवान को छोड़कर द्वैतभाव में लिप्त होते हैं, ऐसे लोग जन्म-मरण के बन्धन में पड़े रहते हैं॥ ३॥
4हे परमेश्वर ! जो तेरी शरण में आ जाते हैं, वे संसार के दुखों अथवा लालसाओं से रहित हो जाते हैं।
5नानक अनुरोध करते हैं कि हे संसार के लोगो ! तुम सदैव परमात्मा की स्तुति करो, गुरु के सच्चे उपदेश द्वारा परमेश्वर में लीन हो जाओगे॥ ४॥ ४॥
6प्रभाती महला ३ ॥
7हे मनुष्य ! ज़ब तक जीवन-प्राण हैं, गुरु द्वारा परमात्मा का ध्यान करो।
8गुरु के उपदेश से मन निर्मल हो जाता है और मन का अभिमान निवृत्त हो जाता है।
9उसी प्राणी का जीवन सफल होता है, जो परमात्मा के नाम में लीन रहता है।॥ १॥
10हे मेरे मन ! गुरु की शिक्षा सुनो।
11परमात्मा का नाम सदा सुख देने वाला है, अतः स्वाभाविक हरिनाम रस पान करो॥ १॥रहाउ॥
12अपने मूल-परमेश्वर को मानने वाले ही आत्म-स्वरूप में रहते हैं और वे स्वाभाविक ही सुखी होते हैं।
13गुरु के उपदेश से हृदय-कमल खिल उठता है और अहम् एवं दुर्बुद्धि दूर हो जाती है।
14कोई विरला पुरुष ही इस सच्चाई को जानता है कि सब में एक परमेश्वर ही व्याप्त है॥ २॥
15गुरु की शिक्षा से ही मन निर्मल होता है और वह अमृतमय हरिनामोच्चारण करता है।
16परमात्मा का नाम सदा उसके मन में बस जाता है और उस पर विश्वस्त होता है।
17मैं अपने गुरु पर सदैव कुर्बान जाता हूँ, जिसने परमात्मा की मुझे पहचान दी है॥ ३॥
18यदि मनुष्य जन्म में सतिगुरु की सेवा नहीं की तो जीवन व्यर्थ ही जाता है।
19जब ईश्वर की कृपा होती है तो सच्चे गुरु से संपर्क हो जाता है और स्वाभाविक ही सहजावस्था प्राप्त होती है।
20हे नानक ! परमात्मा के नाम से ही कीर्ति प्राप्त होती है और पूर्ण भाग्य से ही प्रभु का ध्यान होता है॥ ४॥ ५॥
21प्रभाती महला ३ ॥
22प्रभु ने स्वयं ही अनेक प्रकार के (जीवों, पशु-पक्षियों इत्यादि) की सृष्टि बनाकर जगत-तमाशा रचा है।
23वह बनाकर सबका पोषण करता है और सब जीवों को रिजक देता है।॥ १॥
24कलियुग में ईश्वर विद्यमान है।
25वह कण कण में व्याप्त है और गुरु के द्वारा हरिनाम के भजन द्वारा प्रगट होता है॥ १॥रहाउ॥
26कलियुग में परमेश्वर गुप्त रूप से व्याप्त है, वह प्रत्येक शरीर में भरपूर है।
27जो गुरु की शरण में आता है, हरिनाम रत्न उसी के हृदय में प्रगट होता है।॥ २॥
28वह गुरु से शिक्षा प्राप्त करके पाँच इन्द्रियों को काबू कर लेता है और क्षमा-संतोष की भावना धारण कर लेता है।
29वह हरि-भक्त भाग्यशाली एवं धन्य है, जो प्रेम-पूर्वक भगवान का गुणगान करता है।॥ ३॥
30यदि कोई गुरु से मुँह फेर लेता है, गुरु का वचन मन में धारण नहीं करता।
31वह कर्मकाण्ड करके बेशुमार धन दौलत जमा करता है, वह जो कुछ करता है, इसके बावजूद नरक में ही पड़ता है॥ ४॥
32केवल शब्द ही व्याप्त है, वह प्रभु सर्वव्यापक है, केवल उसी का संसार में हुक्म चलता है और केवल एक परमेश्वर से ही पूरा संसार उत्पन्न हुआ है।
33हे नानक ! गुरु के द्वारा जब ईश्वर से मिलाप होता है तो मनुष्य उसी में समाहित हो जाता है।॥ ५॥ ६॥
34प्रभाती महला ३ ॥
35हे मेरे मन ! अपने गुरु की स्तुति करो;
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं