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गुरु ग्रंथ साहिब 132 · Raag Maajh · Guru Arjan Dev Ji

1हे ईश्वर ! तूने भक्तों को संसार रूपी अंधकूप में से निकाल कर पार कर दिया है।

2और तूने अपनी कृपा-दृष्टि करके अपने भक्तों को कृतार्थ कर दिया है

3हे पूर्ण अविनाशी प्रभु ! सेवक तेरे गुणों का गुणगान करते हैं। कहने एवं श्रवण करने से भी प्रभु के गुणों में कभी कमी नहीं आती ॥ ४॥

4हे प्रभु ! इहलोक तथा परलोक में तुम ही रक्षक हो।

5तुम ही माता के गर्भ में आए शिशु का पालन-पोषण करते हो।

6जो प्रभु के प्रेम में मग्न हुए उसकी कीर्ति का गायन करते हैं, उन्हें माया की अग्नि प्रभावित नहीं कर सकती ॥ ५॥

7हे परमात्मा ! मैं तेरे कौन-कौन से गुणों को कहकर स्मरण करुं?

8मैं अपने मन एवं तन में तुझे ही मौजूद देखता हूँ।

9हे प्रभु ! तुम ही मेरे मित्र, मेरे साजन एवं मेरे स्वामी हो। तेरे अलावा मैं अन्य किसी को भी नहीं जानता ॥ ६॥

10हे प्रभु ! जिस पुरुष के तुम सहायक सिद्ध हुए हो,

11उसे कोई गर्म हवा भी नहीं लगती अर्थात् किसी प्रकार की कोई पीड़ा नहीं आती।

12हे परमात्मा ! तू सबका मालिक है, तू ही आश्रयदाता एवं सुखदाता है। सत्संग में तेरे नाम की आराधना करने से तुम प्रकट हो जाते हो ॥ ७ ॥

13हे प्रभु ! तुम सर्वोच्च, अथाह, अनन्त एवं अनमोल हो।

14तू ही मेरा सच्चा साहिब है और मैं तेरा सेवक एवं दास हूँ।

15तुम सम्राट हो और तेरा साम्राज्य सत्य है। हे नानक ! मैं प्रभु पर तन-मन से न्यौछावर हूँ ॥ ८ ॥ ३ ॥ ३७ ॥

16माझ महला ५ घरु २ ॥

17हे प्राणी ! हमें सदैव ही दयालु भगवान का सिमरन करना चाहिए और

18उस प्रभु को कभी भी अपने हृदय से विस्मृत नहीं करना चाहिए ॥ १॥ रहाउ॥

19यदि सन्तों की संगति की जाए

20तो जीव को यम-मार्ग में नहीं जाना पड़ेगा।

21हरि के नाम का यात्रा-खर्च प्राप्त करो। उसे प्राप्त करने से तेरी वंश को कोई कलंक नहीं लगेगा ॥ १II

22जो व्यक्ति परमात्मा की आराधना करते हैं,

23उन्हें नरक में नहीं डाला जाता।

24जिनके मन में ईश्वर ने आकर निवास कर लिया है, उनको गर्म हवा भी नहीं लगती अर्थात् उन्हें कोई दुःख नहीं पहुँचता॥ २॥

25वहीं व्यक्ति सुन्दर एवं शोभनीय हैं

26जो सत्संग में वास करते हैं।

27जिन्होंने ईश्वर के नाम का धन अर्जित किया है वह बड़े दूरदर्शी और अपरम्पार हैंII ३ II

28जो प्रभु-भक्त सत्संग में मिलकर हरि-नाम रूपी अमृत रस का पान करता है,

29मैं उस भक्त के दर्शन करके ही जीता हूँ।

30हे प्राणी ! सदैव गुरु-चरणों की पूजा करके अपने समस्त कार्य संवार लो॥ ४॥

31जिसे प्रभु ने अपना सेवक बना लिया है, वहीं भगवान का सिमरन करता है।

32वही शूरवीर है और वही प्रधान है जिसके मस्तक पर भाग्य रेखाएँ विद्यमान हैं।॥ ५II

33जिस व्यक्ति ने भगवान का अपने मन में सिमरन किया है, उसने ही इस रस का पान किया है।

34हरि-रस का भोग ही प्रभुता के रस मानने की भाँति है।

35नाम-सिमरन करने वालों के मन में कदाचित बुराई उत्पन्न नहीं होती। वे नाम-सिमरन के शुभ-कर्म में लगकर भवसागर से पार हो जाते हैं।॥ ६॥

36जिसने सृष्टि-कर्ता प्रभु को अपने हृदय में वसा लिया है

37उसने मानव जीवन का फल प्राप्त कर लिया है।

38हे जीव-स्त्री ! तुझे अपना मनपसंद हरि-प्रभु मिल गया है और अब तेरा सुहाग स्थिर हो गया है॥ ७ II

39तब हरि-नाम रूपी अटल पदार्थ मिल गया

40जब मैं भयनाशक प्रभु की शरण में आया।

41हे नानक ! भगवान ने अपने दामन से लगाकर तुझे भवसागर से पार कर दिया है और तूने अपनी जीवन-बाजी को जीत कर अपार प्रभु को प्राप्त कर लिया है॥ ८॥ ४॥ ३८ ॥

42ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।

43माझ महला ५ घरु ३ ॥

44भगवान का नाम जपने से मेरे मन को धैर्य हो गया है॥ १ ॥ रहाउ॥

45गुरदेव का नाम-सिमरन करने से मेरे तमाम भय मिट गए हैं।॥ १॥

46जो पारब्रहम की शरण में आ जाता है, वह फिर चिन्ता क्यों करेगा ? ॥ २॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं