सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 1328 · Raag Prabhaatee · Guru Nanak Dev Ji

1दुखों के पश्चात् सुख प्राप्त होता है और सुखी रहने के उपरांत दुख भी आते हैं।

2जिस मुख से तेरी प्रशंसा की जाती है, उसे कोई भूख नहीं रहती।॥ ३॥

3गुरु नानक कथन करते हैं कि एकमात्र मैं ही मूर्ख हूँ, अन्य संसार भला है।

4लेकिन जिस शरीर में परमात्मा का नाम उत्पन्न नहीं होता, वह ख्वार ही होता है॥ ४॥ २॥

5प्रभाती महला १ ॥

6जिस (परमेश्वर) को पाने के लिए ब्रह्मा ने वेदों का उच्चारण किया तथा भोलेशंकर ने माया छोड़ दी।

7जिसके लिए सिद्ध त्यागी बन गए और देवी-देवताओं ने भी रहस्य प्राप्त नहीं किया॥ १॥

8हे बाबा ! मन में सत्यस्वरूप का मनन करो, मुख से सच्चे प्रभु का भजन करो क्योंकि सच्चे परमेश्वर से ही मुक्ति मिलती है।

9अगर कोई ईश्वर का बोध पा ले तो दुश्मन एवं दुख भी उसके निकट नहीं आता॥ १॥रहाउ॥

10यह सृष्टि अग्नि, जल एवं पवन की बनी हुई है और यह तीनों ही हरिनाम के दास हैं।

11जो परमात्मा का नाम नहीं लेता, वस्तुतः वह चोर है और पचासवें कोट में बसता है।॥ २॥

12यदि कोई व्यक्ति एक भी भला कार्य करता है तो मन में बहुत एहसान जतलाता है।

13परन्तु ईश्वर में इतने गुण हैं, इतनी अच्छाइयाँ हैं कि लोगों को देता ही रहता है (संसारी जीव ईश्वर से नियामतें पाकर भी उसका एहसान नहीं मानते) परन्तु वह दातार देने के बाद एहसान की बात नहीं सोचता॥ ३॥

14गुरु नानक का कथन है कि हे प्रभु ! तेरी स्तुति करने वाले को ही ऐश्वर्य प्राप्त होता है और तू ही मेरा धन है।

15यदि कोई इनका आदर करता है तो उसे यमराज को हिसाब नहीं देना पड़ता॥ ४॥ ३॥

16प्रभाती महला १ ॥

17जिसका कोई रूप नहीं, कोई उच्च जाति नहीं, न ही सुन्दर चेहरा अथवा शरीर है,

18जब सतगुरु से मिलता है तो उसे ईश्वर की प्राप्ति हो जाती है और हरिनाम में ही लीन रहता है॥ १॥

19हे अवधूत योगी ! सहज तत्व का चिंतन करो,

20जिससे पुनः संसार में आना न पड़े॥ १॥रहाउ॥

21जिसका कोई कर्म नहीं, न ही धर्म है, न ही जपमाला है,

22जब सतगुरु रखवाला बनता है, तो उसे कल्याणमय ज्योति से विवेक बुद्धि प्राप्त होती है।॥ २॥

23जो व्रत-उपवास नहीं रखता, न ही कोई नियम धारण करता है, जो शास्त्रानुसार चतुरता भरे वचन नहीं करता।

24सतिगुरु का फुरमान है कि उसे भले-बुरे की चिंता नहीं होती।॥ ३॥

25जिसे कोई आशा नहीं, आशाओं से रहित है, वह मन को समझाता है।

26हे नानक ! विवेक बुद्धि को पाकर उसकी आत्मा परमात्मा में ही मिल जाती है॥४॥४॥

27प्रभाती महला १ ॥

28उस महापुरुष की कही बात प्रभु के दरबार में मान्य होती है,

29जो दुख-सुख को समान मानता है॥ १॥

30उसका क्या यश कथन किया जाए, वह तो पूरे संसार में विद्यमान है।

31हे परमेश्वर ! जो कुछ हो रहा है, सब तेरी मर्जी से हो रहा है॥ १॥रहाउ॥

32तब मन में ज्ञान का उजाला हो गया और अभिमान समाप्त हो गया

33जब सतगुरु ने हरिनाम अमृत प्रदान किया॥ २॥

34कलियुग में उसी व्यक्ति का जीवन सफल माना जाता है,

35जो सच्चे दरबार में सम्मान प्राप्त करता है॥ ३॥

36उसका कहना सुनना अकथनीय प्रभु के घर में स्वीकार होता है,

37गुरु नानक कथन करते हैं कि बेकार की बातें तो जल जाने के बराबर हैं॥ ४॥ ५॥

38प्रभाती महला १ ॥

39गुरु-ज्ञान द्वारा ही मन अमृत जल में स्नान करता है और अड़सठ तीर्थों का फल साथ ही ग्रहण करता है।

40गुरु का उपदेश अमूल्य मोती एवं माणिक्य है, जिसे शिष्य खोज सकता है॥ १॥

41गुरु के समान कोई तीर्थ नहीं,

42दरअसल गुरु ही संतोष का सरोवर है॥ १॥रहाउ॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं