गुरु ग्रंथ साहिब 1325 · Raag Kalyaan · Guru Raam Daas Ji
1जो महा बदनसीब होते हैं, उनको साधुओं की चरण-धूल नहीं मिलती।
2वे तृष्णाग्नि में जलते रहते हैं, उनकी तृष्णाग्नि नहीं बुझती और वे यमराज से दण्ड के भागीदार बनते हैं।॥ ६॥
3लोग तीर्थ यात्रा करते हैं, व्रत-उपवास रखते हैं, यज्ञ करवाते हैं एवं दान-पुण्य करते हैं, बर्फ में शरीर को गला-गला कर कष्ट पहुँचाते हैं,
4परमात्मा का नाम अतुलनीय है, ये कर्म-धर्म गुरु की शिक्षा की बराबरी नहीं कर सकते और न ही इनकी नाम से तुलना हो सकती है॥ ७॥
5हे ब्रह्म ! तेरे गुण अपार हैं, तू ही जानता है। दास नानक तेरी शरण में पड़ा है।
6तू सागर है, हम तुम्हारी मछलियां हैं, कृपा करके अपने साथ ही रखो॥ ८॥ ३॥
7कलिआन महला ४ ॥
8हे सज्जनो ! राम हर जगह पर विद्यमान है, राम की ही अर्चना करो।
9मन, तन सर्वस्व उसके आगे अर्पण कर दो, गुरु-उपदेशानुसार ज्ञान दृढ़ करो॥ १॥रहाउ॥
10ब्रह्म नाम एक ऐसा वृक्ष है, जिसके अपार गुण शाखाएँ हैं, नित्य उसकी अर्चना करो।
11आत्मा पूज्य देव है और पूज्य देव ही आत्मा है, प्रेम से इसकी अर्चना करो॥ १॥
12विवेक बुद्धि समूचे जगत में निर्मल है, चिंतन करके नाम रस पान करो।
13गुरु की कृपा से नाम पदार्थ प्राप्त हुआ है, यह मन सतगुरु को न्यौछावर कर दो॥ २॥
14प्रभु नाम रूपी हीरा अमूल्य एवं सर्वोत्तम है, मन रूपी हीरे को नाम हीरे से बिंध लो।
15मन रूपी मोती गुरु के शब्द द्वारा जौहरी बन जाता है, जिससे नाम रूपी हीरे की परख होती है।३॥
16संतों की संगत में साधारण व्यक्ति महान् बन जाता है, ज्यों पीपल का वृक्ष पलाश के वृक्ष को स्वयं में विलीन कर लेता है।
17सब जीवों में मनुष्य सबसे उत्तम है, उस से राम नाम की महक आती है॥ ४॥
18वह अनेक निर्मल कर्म करता है, अतः उसके सत्कर्मों की शाखाएँ हरी भरी रहती हैं।
19गुरु ने ज्ञान देकर समझाया है कि धर्म ही फल फूल है अतः इसकी खुशबू जगत में फैलाओ॥ ५॥
20एक परम ज्योति मन में अवस्थित है, सब में एक ब्रह्म ही दृष्टिगोचर होता है।
21आत्मा-परमात्मा अभिन्न है, सबमें एक वही व्याप्त है, अतः सबके चरणों में सिर झुकाना चाहिए॥ ६॥
22हरिनाम के बिना मनुष्य बेशर्म हैं, उन्होंने अपनी नाक ही काट ली है।
23निरीश्वरवादी मनुष्य अहंकारी कहलाते हैं, हरिनाम के बिना इनका जीना धिक्कार है॥ ७॥
24जब तक जीवन-साँसें हैं, तत्क्षण प्रभु की शरण में पड़ो।
25नानक विनती करते हैं कि हे परमेश्वर ! मुझ पर कृपा करो, ताकि मैं साधु-पुरुषों के चरण धोता रहूं॥ ८॥ ४॥
26कलिआन महला ४ ॥
27हे राम ! मैं साधु-पुरुषों के चरण धोना चाहता हूँ।
28हे मेरे ठाकुर ! ऐसी कृपा करो कि पल में पाप-दोष नष्ट हो जाएँ॥ १॥रहाउ॥
29भिखारी दीनता से तेरे द्वार पर खड़े हैं, इन तरस रहे जीवों को नाम-दान दो।
30हे प्रभु ! तेरी शरण में आया हूँ, मुझे बचा लो और गुरु की शिक्षा द्वारा नाम ही दृढ़ करवाओं॥ १॥
31शरीर रूपी नगरी में काम क्रोध सशक्त हैं, जो नित्य लड़ते रहते हैं।
32हे पूर्णगुरु ! अपना बनाकर बचा लो और इन दुष्टों को निकाल दो॥ २॥
33अन्तर्मन में विषय-विकारों की प्रचंड अग्नि ताकतवर है, अतः बर्फ समान शीतल शब्द-गुरु प्रदान करो।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं