सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 1323 · Raag Kalyaan · Guru Arjan Dev Ji

1दास नानक तो पूर्णपरमेश्वर की शरण में आ गया है॥ २॥५॥ ८॥

2कलिआन महला ५ ॥

3अन्तर्यामी मेरा प्रभु सब जानने वाला है।

4हे पूर्णपरमेश्वर ! तू शाश्वत है, कृपा करो, सच्चा शब्द ही परवाना है॥ १॥रहाउ॥

5परमात्मा के अतिरिक्त अन्य कोई समर्थ नहीं, एकमात्र तेरी ही मुझे आशा है और तेरा ही मन में बल है।

6हे सब शरीरों के दाता, स्वामी ! जो तू देता है, वही खाता एवं पहनता हूँ॥ १॥

7आत्मा, बुद्धि, चतुराई. शोभा, रूप-रंग, धन, मान-सम्मान, सर्व सुख एवं आनंद एकुमात्र वही देने वाला है।

8नानक अनुरोध करते हैं कि राम नाम का भजन करो, इसी में कल्याण निहित है॥ २॥६॥ ९॥

9कलिआन महला ५ ॥

10प्रभु-चरणों की शरण कल्याणकारी है।

11प्रभु का नाम पतितों को पावन कर देता है॥ १॥रहाउ॥

12जो साधुओं के साथ परमात्मा का भजन करते हैं, मौत उनको ग्रास नहीं बनाती॥ १॥

13मुक्ति, युक्ति एवं अनेक सुख भी परमात्मा की भक्ति के बराबर नहीं पहुँचते।

14दास नानक तो प्रभु के दर्शन में ही आसक्त है, ताकि पुनः योनि-चक्र में भटकना न पड़े॥ २॥७॥ १०॥

15कलिआन महला ४ असटपदीआ ॥

16ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

17सृष्टि के कण-कण में राम ही व्याप्त है, राम नाम सुनने से मन प्रसन्न हो जाता है।

18परमात्मा का नाम अमृत की तरह मधुर है और गुरु की शिक्षा से सहज-स्वाभाविक इसका पान करो॥ १॥रहाउ॥

19जिस प्रकार लकड़ी में अग्नि मौजूद है और संयम से निकाल लिया जाता है,

20वैसे ही राम नाम सर्वत्र व्याप्त है और गुरु की शिक्षानुसार प्राप्त होता है।॥ १॥

21आँखें, नाक, कान इत्यादि शरीर के नौ द्वार व्यर्थ हैं और दसम द्वार से ही हरिनाम अमृत की धारा बहती है।

22हे प्यारे ! कृपा करो, गुरु के उपदेश द्वारा हरिनाम अमृत का पान करवाओ॥ २॥

23शरीर एक उत्तम है, जिसमें हरिनाम का सौदा किया जाता है।

24यदि गुरु की सेवा की जाए तो अमूल्य रत्न रूपी हरिनाम प्राप्त हो जाता है॥ ३॥

25परमात्मा अगम्य है, प्रेम का सागर है, उसकी भक्ति करनी चाहिए।

26हे हरि ! कृपा करके मुझ सरीखे पपीहे के मुँह में नाम की बूंद डाल दो॥ ४॥

27प्यारा प्रभु प्रेम के रंग से भरा हुआ है, प्रेम के रंग से रंगने के लिए मन गुरु को अर्पण कर दो।

28प्रभु के रंग में लीन रहो और खूब मजे लेकर हरिनाम का पान करो॥ ५॥

29यदि पृथ्वी, सात द्वीपों एवं सागरों से स्वर्ण निकाल कर भक्तजनों को दिया जाए तो

30मेरे प्रभु के भक्त इनकी आकांक्षा नहीं करते, बल्कि हरि-भक्ति एवं नाम अमृत ही चाहते हैं।॥ ६॥

31मायावी प्राणी सदा लालसा ही करते हैं, उनकी धन-दौलत की भूख कभी नहीं मिटती।

32वे माया से इतना प्रेम करते हैं कि उसे पाने के लिए लाखों कोस की दूरी तय करके भी पहुँच जाते हैं।॥ ७॥

33परमात्मा के भक्त उत्तम हैं, इनको क्या उपमा दी जाए।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं