सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 1322 · Raag Kalyaan

1कलिआन महला ५ ॥

2मेरे प्रभु की शोभा

3सदैव नवीन एवं मन को रंगने वाली है॥ १॥रहाउ॥

4ब्रह्मा, शिवशंकर, सिद्ध, मुनि एवं इन्द्र इत्यादि भक्ति एवं यश ही मांगते हैं।॥ १॥

5बड़े-बड़े योगी, ज्ञानी, ध्यानी एवं शेषनाग इत्यादि सब परमात्मा का जाप करते हैं।

6नानक का कथन है कि मैं उन संत पुरुषों पर बलिहारी जाता हूँ, जो प्रभु वन्दना में लीन रहकर सदा उसी के साथ रहते हैं।॥ २॥३॥

7कलिआन महला ५ घरु २

8ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

9हे ईश्वर ! तेरी महिमा गाने से ही मान-सम्मान प्राप्त होता है।

10ऑखों से दर्शन करने, जिव्हा से नामोच्चारण, कानों से कीर्तन सुनने से अंग-अंग एवं प्राणों को सुख प्राप्त होता है॥ १॥रहाउ॥

11इधर-उधर, दसों दिशाओं, पर्वतों एवं तृण में समान रूप से ईश्वर ही व्याप्त है॥ १॥

12जहाँ भी देखा जाए, उधर प्रभु ही नज़र आता है, वह परम पुरुष, संसार का स्वामी एवं प्रधान है।

13नानक यही ब्रह्मज्ञान कथन करते हैं कि साधु पुरुषों की संगत में सब भ्रम भय मिट जाते ॥२॥१॥४॥

14कलिआन महला ५ ॥

15परमात्मा का गुणगान, शब्द की ध्वनि, आनंददायक वेद-ज्ञान का

16संतों की मण्डली में मिलकर मुनिजन कथन एवं श्रवण करते हैं।॥ १॥रहाउ॥

17वे ज्ञान-चर्चा करते हैं, ध्यानशील रहते हैं, मोह-माया को छोड़ने की प्रेरणा करते हैं, मन से प्रेमपूर्वक परमात्मा का नाम जपते और पापों का खण्डन करते हैं।॥ १॥

18वे तत्व वेता योग-युक्ति, ज्ञान-भोग, शब्द का चिन्तन, जाप-तपस्या करते हैं।

19नानक फुरमाते हैं कि वे परम ज्योति में पूर्णतया मिल जाते हैं और उनको कोई दुख प्रभावित नहीं करता॥ २॥२॥५॥

20कलिआन महला ५ ॥

21प्रभु-मिलन का क्या तरीका है, उसके लिए मुझे क्या करना चाहिए।

22अनेक व्यक्ति ध्यान लगाते हैं, शास्त्रज्ञ ज्ञान-चर्चा करते हैं, लेकिन इस असह्य अवस्था को किस तरह सहन करूँ॥ १॥रहाउ॥

23क्या मैं विष्णु, महेश, सिद्ध-मुनि अथवा इन्द्र के द्वार पर उनकी शरण में पडूं॥ १॥

24कोई राज देता है, कोई स्वर्ग देता है, लेकिन मुक्ति करोड़ों में से किसी विरले के ही पास है।

25नानक का कथन है कि साधु पुरुषों के चरणों में आने से ही हरिनाम का रस प्राप्त होता है॥२॥३॥६॥

26कलिआन महला ५ ॥

27हे प्रभु ! एकमात्र तू ही मेरे प्राणों का स्वामी है, तू दया का सागर है, परमपुरुष एवं सच्चा साथी है।

28तू ही गर्भ योनि (से मुक्त करने वाला), मौत के जाल एवं दुखों को नष्ट करके बचाने वाला है॥ १॥रहाउ॥

29मैं नाम धारण करके तेरी शरण में आया हूँ,

30हे दयालु प्रभु ! तू ही मेरा आसरा है॥ १॥

31मुझ सरीखे अनाथ एवं दीन को तेरी ही आशा है,

32हे स्वामी ! तेरा नाम ही मन में मंत्र है॥ २॥

33हे प्रभु ! तेरे सिवा मैं कुछ नहीं मानता और

34समूचे जगत में तुम्हें ही पहचानता हूँ॥ ३॥

35मेरे मन में दिन-रात परमात्मा ही बसता है और

36नानक का कथन है कि, उसका ही मुझे आसरा है॥ ४॥ ४॥ ७॥

37कलिआन महला ५ ॥

38मन तन से भगवान का जाप करना चाहिए।

39पूर्ण गुरु के प्रसन्न होने पर सदैव सुख एवं कल्याण प्राप्त होता है।॥ १॥रहाउ॥

40ईश्वर के गुण-गान से सभी कार्य सिद्ध हो गए हैं।

41साधुजनों के संग मिलकर प्रभु का सिमरन किया तो दुख एवं काल दूर हो गए॥ १॥

42हे मेरे प्रभु ! मुझ पर कृपा करो, ताकि दिन-रात तेरी सेवा में तल्लीन रहूँ।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं