सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 1320 · Raag Kalyaan · Guru Raam Daas Ji

1हे मेरे मन ! संसार के स्वामी प्रभु का भजन करो;

2यदि गुरु के उपदेश से परमात्मा का ध्यान किया जाए तो सब पाप-दुख निवृत्त हो जाते हैं।॥ १॥रहाउ॥

3हे प्रभु ! हमारी एक जीभ तुम्हारा यश नहीं गा सकती, अतः अनेक जीभों वाला बना दो।

4अगर ये सभी बार-बार हर पल तुम्हारा गुणगान करेंगी तो भी तेरे गुणों का कथन नहीं कर सकती॥ १॥

5हे स्वामी प्रभु! हमने तुम्हारे साथ प्रेम लगा लिया है, अब हम तेरे ही दर्शन चाहते हैं।

6तुम सब जीवों के बड़े दाता हो, तुम ही हमारी पीड़ा को जानते हो।॥ २॥

7अगर कोई मुझे प्रभु का मार्ग बताता है तो उसे भला क्या अर्पण करूँ ?

8अगर कोई प्रभु से मिलाता है, तो तन-मन सर्वस्व अर्पण कर दूँ॥ ३॥

9परमात्मा के गुण बेअंत हैं, उसकी शोभा बेशुमार है, हम तुच्छ मात्र ही वर्णन करते हैं।

10हे नानक के समर्थ प्रभु ! हमारी बुद्धि सब तुम्हारे वश में है॥ ४॥ ३॥

11कलिआनु महला ४ ॥

12हे मेरे मन ! परमात्मा का भजन करो, उसके गुण अकथनीय सुने जाते हैं।

13धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष इत्यादि सब भक्तों के पीछे लगे रहते हैं॥ १॥रहाउ॥

14वही भक्त परमात्मा का ध्यान करता है, जिसके माथे पर सौभाग्य होता है।

15जहाँ प्रभु के दरबार में कमों का हिसाब मांगा जाता है, वहाँ हरिनाम का ध्यान करने वाला मुक्त हो जाता है॥ १॥

16हमने बहुत सारे दोष किए हैं, जन्म-जन्मांतर के दुख एवं अहंकार की मैल लगी हुई थी।

17गुरु ने कृपा करके हरिनाम जल में स्नान करवाया तो सब पाप-दोष निवृत्त हो गए॥ २॥

18दास के हृदय में प्रभु बसा हुआ है, अतः वह हरि-भजन में लीन रहता है।

19जब जीवन का अन्तिम समय आ जाता है, तब प्रभु का नाम ही साथी बनकर रक्षा करता है॥ ३॥

20हे प्रभु ! सेवक हरदम तेरा ही यश गाता है, जगत के मालिक का भजन करता है।

21हे नानक के प्रभु ! तुम ही रक्षक हो, हम पत्थरों को डूबने से बचा लो॥ ४॥ ४॥

22कलिआनु महला ४ ॥

23हमारी भावना को प्रभु भलीभांति जानता है।

24अगर कोई भक्त की निंदा करता है तो प्रभु उसका बिल्कुल कहना नहीं मानता॥ १॥रहाउ॥

25अन्य-सब कर्मकांड छोड़कर परमेश्वर की उपासना करो, जो सबसे बड़ा मालिक है।

26भगवान की अर्चना करने से काल भी बुरी नजर नहीं डालता, बल्कि भक्त के चरणों में आ पड़ता है।॥ १॥

27जिसको मेरा स्वामी बचा लेता है, उसके कानों में सुमति डाल देता है।

28जिसकी भक्ति को मेरा प्रभु स्वीकार कर लेता है, उसका कोई कुछ बिगाड़ नहीं सकता॥ २॥

29हे लोगो ! परमात्मा की अद्भुत लीला देखो, जो बुरे-भले को एक पल में पहचान लेता है।

30तभी तो सेवक को आनंद पैदा हो गया है, दरअसल साफ दिल वाले ईश्वर से मिल जाते हैं और खोटे इन्सान पछताते ही रहते हैं।॥ ३॥

31हे परमेश्वर ! तू ही देने वाला है, सर्वशक्तिमान एवं जगत का स्वामी है, मैं तुझसे नाम दान मांगता हूँ।

32नानक विनती करते हैं कि हे प्रभु ! मुझ पर कृपा करो, ताकि मेरे हृदय में सदैव तेरे चरण बसते रहें॥ ४॥ ५॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं