सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 1319 · Raag Kalyaan

1रागु कलिआन महला ४ ॥

2वह अद्वितीय परमेश्वर केवल (ऑकार स्वरूप) एक है, नाम उसका सत्य है, वह संसार को बनाने वाला है, सर्वशक्तिमान है, निर्भय है, उसका किसी से वैर नहीं, वह कालातीत ब्रह्मा मूर्ति सदा अमर है, वह जन्म-मरण के चक्र से रहित है, वह स्वतः प्रकाशमान हुआ, स्वयंभू है, गुरु-कृपा से प्राप्त होता है।

3परमेश्वर सर्वत्र व्याप्त है, कोई भी उसका रहस्य नहीं पा सका।

4हे स्रष्टा ! हम बच्चों का तू ही पालन-पोषण करने वाला है, तू महान् है, तुम ही हमारे माता-पिता हो॥ १॥रहाउ॥

5ईश्वर के असंख्य नाम हैं, वह अगम्य, असीम एवं अपहुँच है।

6गुणवान एवं ज्ञानी लोगों ने बहुत मनन किया है, लेकिन वे तिल मात्र भी रहस्य नहीं पा सके॥ १॥

7वे सदैव परमात्मा का गुणगान करते हैं, पर उसके गुणों का भेद प्राप्त नहीं होता।

8हे स्वामी ! तू असीम, अतुलनीय एवं परे से भी परे है, कितना ही जाप किया जाए, तेरी गहराई को पाया नहीं जा सकता॥ २॥

9हे माधव ! भक्तजन तुम्हारी स्तुति करते हैं, तेरे गुण गाते हैं।

10तुम सागर हो, हम तुम्हारी मछलियाँ हैं, तेरा रहस्य नहीं पा सके॥ ३॥

11हे दुष्टदमन ! सेवक पर जरा कृपा करो, अपने नाम का जाप करने के लिए बल प्रदान करो।

12नानक का कथन है कि मुझ सरीखे मूर्ख एवं अज्ञानांध का तो हरिनाम ही एकमात्र आसरा है, जो गुरु से मुझे प्राप्त हुआ है॥ ४॥ १॥

13कलिआनु महला ४ ॥

14हरि-भक्त केवल हरि के गुण गाता हुआ अपनी खुशी का इजहार करता है।

15गुरु की शिक्षा से हरि-भक्ति में प्रीति लगाई, दरअसल प्रारम्भ से ही भाग्य में ऐसा लिखा हुआ था॥ १॥रहाउ॥

16दिन-रात गुरु के चरणों का स्मरण करता हूँ, जिससे मन में भगवान बस गया है।

17ज्यों चन्दन को घिसकर खुशबू को फैलाया जाता है, वैसे ही भगवान की कीर्ति पूरे जगत में फैली हुई है॥ १॥

18हरि-भक्त ने हरि में लगन लगाई तो अनीश्वरवादी लोग ईष्या अथवा विरोध करने लगे।

19जैसे कर्मानुसार निंदक व्यक्ति जीवन चलाता है, वैसे ही इर्षा की अग्नि में जलता है, जैसे नागिन के डंक से मृत्यु हो जाती है।॥ २॥

20हे स्वामी हरि ! तुम अपने भक्तों के रखवाले हो, युग-युग से रक्षा करते आ रहे हो।

21दैत्य हिरण्यकशिपु ने निंदा की, पर भला क्या बिगाड़ सका, सभी कोशिशें करने के बावजूद अन्त में मौत की नींद ही सोया॥ ३॥

22जितने भी जीव-जन्तु प्रभु ने पैदा किए हैं, सभी मौत के मुँह में जाने वाले हैं।

23नानक का फुरमान है कि परमात्मा ने सदैव ही भक्तों की रक्षा की है और भक्तजन उसी की शरण में पड़े हैं।॥ ४॥ २॥

24कलिआनु महला ४ ॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं