गुरु ग्रंथ साहिब 1317 · Raag Kaanraa · Guru Raam Daas Ji
1जगत का स्वामी प्रभु उनको ही मिलता है, जिनके भाग्य में लिखा होता है।
2हे नानक ! गुरु के वचन से परमात्मा के नाम का ध्यान किया है और मन में उसी का जाप किया है॥ १॥
3महला ४॥
4सज्जन प्रभु को पा लो, यदि उत्तम भाग्य हो तो वह मन में बस जाता है।
5नानक फुरमाते हैं-पूर्ण गुरु ने परमात्मा के दर्शन करवाए हैं, अब उसी में लगन लगी हुई है॥ २॥
6पउड़ी॥
7वह जीवन-घड़ी सफल, सुहावनी एवं धन्य है, जब ईश्वर की सेवा मन को अच्छी लगी।
8हे मेरे गुरु के शिष्यो ! मुझे हरि-कथा सुनाओ, उस प्रभु की कथा अकथनीय है।
9मेरा चतुर प्रभु क्योंकर पाया जाता है, क्योंकर उसके दर्शन होते हैं ?
10वह स्वयं ही मिलाता है, स्वयं ही दर्शन करवाता है और गुरु के वचनों से जीव प्रभु में ही विलीन हो जाता है।
11हे नानक ! मैं उन लोगों पर कुर्बान जाता हूँ, जो ईश्वर का नाम जपते हैं॥ १०॥
12श्लोक महला ४॥
13गुरु ने ज्ञान का सुरमा दिया तो ये आँखें प्रभु में ही लीन हो गई।
14इस तरह हे नानक ! मैंने सहज स्वाभाविक ही सज्जन प्रभु को पा लिया॥ १॥
15महला ४॥
16गुरमुख के अन्तर्मन में सुख शान्ति बसी रहती है, उसके मन तन में हरिनाम समाया रहता है।
17वह नाम का चिन्तन करता है, हरिनाम का पठन करता है और नाम में ही ध्यानशील रहता है।
18हरिनाम पदार्थ पाने से सब चिन्ता दूर हो जाती है।
19यदि सतगुरु से मिलाप हो जाए तो ही हरिनाम उपजता है और तृष्णा-भूख सब दूर हो जाती है।
20हे नानक ! हरिनाम में तल्लीने रहने वाला ही नाम को पाता है॥ २॥
21पउड़ी॥
22हे प्रभु ! तूने जगत को उत्पन्न करके अपने वश में किया हुआ है।
23किसी को स्वेच्छाचारी बनाकर जीवन में हरा दिया है और किसी को गुरु से मिलाकर जीवन-बाजी में जीत का हकदार बना दिया है।
24प्रभु का नाम उत्तम है और गुरु के वचन से कोई भाग्यशाली ही लेता है।
25जब गुरु ने हरिनाम प्रदान किया तो दुख-दारिद्र सब दूर हो गए।
26सभी मन एवं जगत को मोहित करने वाले प्रभु का सुमिरन (स्मरण) करो, जिसने जगत को उत्पन्न करके सब जीवों को वश में किया हुआ है।॥ ११॥
27श्लोक महला ४॥
28मन में अहंकार का रोग लगा होता है, जिस कारण दुष्ट स्वेच्छाचारी पथभ्रष्ट हो जाते हैं।
29नानक का फुरमान है कि जब सतगुरु, सज्जन साधु मिलता है तो यह रोग दूर हो जाता है॥ १॥
30महला ४॥
31जब आँखों से प्रभु के दर्शन किए तो मन तन सुन्दर हो गया।
32हे नानक ! वह प्रभु मुझे मिल गया है, जिसका कीर्तन सुनकर मैं जीता हूँ॥ २॥
33पउड़ी॥
34ईश्वर सम्पूर्ण जगत का मालिक है, वह जगदीश्वर प्रकृति का रचनहार है, परे से परे, परमपुरुष एवं अतुलनीय है।
35हे मेरे गुरु के शिष्यो ! हरिनाम का ध्यान करो, वह उत्तम एवं अमूल्य है।
36जिन्होंने हृदय में दिन-रात ध्यान किया है, वे प्रभु में मिल गए हैं, पथभ्रष्ट नहीं हुए।
37भाग्यशाली को संगत में पूर्ण गुरु का वचन मिलता है।
38हे भक्तजनो ! सभी नारायण का भजन करो, जिसके फलस्वरूप यम का झगड़ा समाप्त हो जाता है॥ १२॥
39श्लोक महला ४॥
40हरि-भक्त हरि भजन में लीन रहता है, यदि कोई मूर्ख तीर का निशाना छोड़ता है,
41नानक फुरमान करते हैं कि हरि-भक्ति में लीन भक्त तो इससे बच जाता है, परन्तु निशाना लगाने वाला स्वयं ही मौत की लपेट में आ जाता है।॥ १॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं