गुरु ग्रंथ साहिब 1316 · Raag Kaanraa · Guru Raam Daas Ji
1सभी कहो, गुरु धन्य है, सतगुरु धन्य है, जिसे मिलकर हमारे अवगुणों पर पर्दा पड़ा है॥ ७॥
2श्लोक महला ४॥
3भक्ति का सरोवर उछल रहा है और भरे सरोवर में भक्तगण बह रहे हैं।
4हे नानक ! जिन्होंने सतगुरु का मनन किया है, वे भाग्यशाली हैं।॥ १॥
5महला ४॥
6परमात्मा के नाम अनगिनत हैं, उसके गुणों का कथन भी नहीं किया जा सकता।
7वह अपहुँच एवं असीम है और किस तरीके से प्रभु से मिलाप हो सकता है।
8जो ईश्वर का यशोगान करते हैं, वे उसकी महत्ता का थोड़ा-सा भी मूल्यांकन नहीं कर सकते।
9नानक का कथन है कि प्रभु स्वत: ही भक्तों को अपने चरणों में मिला लेता है॥ २॥
10पउड़ी॥
11ईश्वर अपहुँच, मन-वाणी से परे है, उसके दर्शन कैसे हो सकते हैं।
12यदि कोई वस्तु हो तो उसका वर्णन किया जाए, उसका रूप एवं आकार नहीं।
13जिसे वह स्वयं समझाता है, वही व्यक्ति दर्शन करता है।
14सत्संगति गुरु की पाठशाला है, जहां गुणों की शिक्षा दी जाती है।
15वह जिव्हा धन्य है, वे हाथ धन्य हैं, वह गुरु अध्यापक भी धन्य है, जहाँ मिलकर प्रभु के गुणों को लिखा जाता है॥ ८॥
16श्लोक महला ४॥
17परमात्मा का नाम अमृत का सागर है, गुरु के प्रेम में उसी का जाप करो।
18हरिनाम पवित्र है, उसका जाप करने एवं यश सुनने से दुख दर्द सब दूर हो जाते हैं।
19परमात्मा के नाम की उन लोगों ने ही आराधना की है, जिनके माथे पर प्रारम्भ से भाग्य लिखा हुआ था।
20जिनके मन में वह बस जाता है, वही भक्त प्रभु दरबार में शोभा पाते हैं।
21हे नानक ! उन्हीं के मुख उज्ज्वल होते हैं, जो मन लगाकर परमात्मा का भजन सुनते हैं।॥ १॥
22महला ४॥
23परमात्मा का नाम सुखों का घर है, जो गुरु द्वारा ही प्राप्त होता है।
24जिनके मस्तक पर पूर्व से ही लिखा होता है, उनको ही सतिगुरु मिलता है।
25मन तन शीतल हो जाता है और मन में शान्ति बस जाती है।
26हे नानक ! परमात्मा का यशोगान करने से दुख-दारिद्रय सब दूर हो जाते हैं॥ २॥
27पउड़ी॥
28हे भाई ! मैं सदके जाता हूँ सदा ही उन (मनुष्यों) पर से। जिन्होंने मेरे प्यारे गुरू का दर्शन (सदा) किया है।
29मेरा सतिगुरु उनको ही मिला है, जिनके ललाट पर भाग्य लिखा हुआ है।
30गुरु की शिक्षा से परमात्मा का ध्यान किया है, उसका कोई रूप अथवा आकार चिन्ह नहीं।
31जिन्होंने गुरु के वचनों से परमात्मा का ध्यान किया है, वे सेवक एवं मालिक एक रूप ही हो गए हैं।
32सभी मुख से नारायण का नाम जपो, हरि की भक्ति से ही विशेष लाभ प्राप्त होता है।॥९॥
33शलोक महला ४॥
34परमात्मा का नाम सर्वव्याप्त है, उसी का भजन करो,
35वह घट घट में अवस्थित है, यह जगत-लीला उस प्रभु ने रची है।
36वह हमारे निकट ही बसता है, वह संसार का जीवन है, गुरु के उपदेश से यही ज्ञान प्रदान किया है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं