सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 1315 · Raag Kaanraa · Guru Raam Daas Ji

1जिससे सभी आशाएँ व वासनाएँ भूल गई हैं और मन से संसार के जंजाल छूट गए हैं।

2गुरु ने प्रसन्न होकर हरिनाम ही दृढ़ करवाया और शब्द द्वारा हमें निहाल कर दिया है।

3दास नानक ने हरिनाम रूपी अक्षुण्ण धन पा लिया है॥ २॥

4पउड़ी॥

5हे हरि ! तुम बहुत बड़े हो, बड़े से भी बड़े, सर्वोच्च, सर्वोपरि एवं महान् हो।

6जो लोग अपरम्पार हरि का ध्यान करते हैं, वे हरि का ध्यान करके उसी का रूप हो जाते हैं।

7हे स्वामी ! जो तेरा यश गाते अथवा सुनते हैं, उनके सब पाप कट जाते हैं।

8गुरु की शिक्षा से हरि-भक्ति को हरि जैसा माना है, वह बड़ा एवं भाग्यशाली है।

9सभी हरि का ध्यान करते हैं, एकमात्र वही सत्यस्वरूप है, युग-युगांतर सत्य है, अब भी सत्य है, सर्वदा सत्य रहने वाला है, दास नानक उसके दासों का दास है॥ ५॥

10श्लोक महला ४॥

11हरि संसार का जीवन है, गुरु ने (हरिनाम) मंत्र दिया तो उसी का हमने जाप किया।

12वह मन-वाणी, ज्ञानेन्द्रियों से परे है और स्वाभाविक ही मिलता है।

13वह सब शरीरों में व्याप्त है और वह बे-अन्त है।

14वह कमलापति सब रसों को भोगता है।

15वह सम्पूर्ण सृष्टि को उत्पन्न करके सब जीवों को रोजी देता है।

16हे दयालु प्रभु ! नाम दान दो, भक्तजन यही मांगते हैं।

17हे नानक के प्रभु ! आकर दर्शन दे दो, हम तो तेरे ही गुण गाते हैं।॥ १॥

18महला ४॥

19हे सज्जन प्रभु ! हमारे मन, तन में तेरा नाम बस गया है।

20गुरु ने सभी आशाएँ पूरी कर दी हैं और हरिनाम यश सुनकर नानक को धैर्य हो गया है॥ २॥

21पउड़ी॥

22हरिनाम सर्वोत्तम है, वह परमपुरुष, मायातीत एवं नित्य-नवीन है।

23जो दिन-रात हरि का जाप करते हैं, माया नित्य उनके चरणों की सेवा करती है।

24ईश्वर सब जीवों की नित्य संभाल करता है और वह सब के निकट ही बसता है।

25वही उसका रहस्य बूझता है, जिसे स्वयं समझाता है और जिस पर सतिगुरु की कृपा-दृष्टि होती है।

26सभी परमात्मा के गुण गाओ, उसका गुणगान कर गुणवान् बन जाओ॥ ६॥

27श्लोक महला ४॥

28हे अज्ञानी मन ! प्रभु का चिंतन कर, सहज समाधि में लीन रहो।

29नानक के मन में प्रभु मिलन का चाव है और गुरु प्रसन्न होकर उससे मिलाता है॥ १॥

30महला ४॥

31एकमात्र प्रभु से ही हमारा प्रेम है, एकमात्र वही मेरे दिल में बसा हुआ है।

32नानक फुरमाते हैं-प्रभु ही एकमात्र आसरा है, उसी से मुक्ति एवं मान-प्रतिष्ठा प्राप्त होती है।॥ २॥

33पउड़ी॥

34गुरु की शिक्षा से पाँच शब्द गूंज उठे, अहोभाग्य से अनाहत नाद गूंजा।

35सब ओर आनंद का मूल स्रोत ईश्वर दृष्टिमान हुआ है और गुरु के शब्द से वही प्रगट हुआ है।

36युग-युगांतर एकमात्र वही स्थित है और गुरु की शिक्षा से प्रभु का भजन किया है।

37हे प्रभु ! दयालु होकर नाम-दान प्रदान करो और भक्तजनों की लाज रखो।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं