सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 1314 · Raag Kaanraa · Guru Raam Daas Ji

1हे ईश्वर ! तू हर जगह पर विद्यमान है, यह सारी दुनिया तेरी ही बनाई हुई है।

2तूने अनेक रंगों वाली सृष्टि बनाई है और अनेक प्रकार के जीव उत्पन्न किए हैं।

3सब में तेरी ही ज्योति कार्यशील है और तू जीवों को गुरु की शिक्षानुसार तल्लीन करता है।

4जिस पर दयालु होता है, उसे सतगुरु से मिला देता है और गुरु द्वारा परम-सत्य का भेद समझा देता है।

5सभी राम का भजन करो, इससे दुख-भूख एवं दारिद्रय सब दूर हो जाता है।॥ ३॥

6श्लोक महला ४॥

7परमात्मा का नाम अमृतमय एवं मीठा रस है, हरिनामामृत को हृदय में धारण करो।

8शब्द के चिंतन द्वारा इस तथ्य की सूझ होती है कि संगत में प्रभु कार्यशील है।

9यदि मन में परमात्मा के नाम का ध्यान किया जाए तो अहम् का जहर निकल जाता है।

10जो हरिनाम का चिंतन नहीं करता, वह पूरा जीवन जुए में हार जाता है।

11गुरु की प्रसन्नता से परमात्मा का चिंतन होता है और हरिनाम हृदय में अवस्थित हो जाता है।

12नानक फुरमाते हैं कि वही मुख सच्चे दरबार में उज्ज्वल होते हैं॥ १॥

13महला ४॥

14कलियुग में ईश्वर का कीर्तिगान ही उत्तम कर्म है।

15गुरु के उपदेशानुसार हरिनाम का कीर्तिगान प्राप्त होता है और प्रभु हृदय में अवस्थित होता है।

16जिसने परमात्मा का ध्यान किया है, वही भाग्यशाली है, उसे हरि-भक्ति का भण्डार सौंपा गया है।

17नाम-संकीर्तन बिना जो कर्म किया जाता है, इससे नित्य अहम् में ख्वार होना पड़ता है।

18यह इस तरह है जैसे हाथी को जल में नहलाया जाता है तो फिर भी वह सिर पर धूल ही डालता है।

19हे ईश्वर ! दया करके सतगुरु से मिला दो, ताकि मन में ऑकार(ओंकार) बस जाए।

20नानक फुरमाते हैं कि जिसने गुरु से परमात्मा का नाम-संकीर्तन सुना है, मनन किया है, उसी की जय जयकार हुई है॥ २॥

21पउड़ी॥

22राम का नाम ही उत्तम वस्तु है और समूची सृष्टि का नायक ईश्वर हमारा मालिक है।

23यह जगत-तमाशा ईश्वर ने रचा है, वह स्वयं ही कार्यशील है और समूचे जगत को उसने व्यापारी बनाया हुआ है।

24हे कर्ता पुरुष ! सब में तेरी ज्योति विद्यमान है और सब ओर तेरा ही सत्य रूप में प्रसार है।

25हे निराकार ! सभी तेरा ध्यान करते हैं, गुरु-मतानुसार तेरा गुणानुवाद कर अपना जीवन सफल करते हैं।

26हे भक्तजनो ! सभी मुख से परमात्मा का भजन करो, वह जगत का मालिक,-जगत का जीवन है, वही संसार-सागर से पार उतारने वाला है॥ ४॥

27श्लोक महला ४॥

28हे प्रभु! हमारी जिव्हा केवल एक है, लेकिन तेरे गुण अगम्य एवं अथाह हैं।

29हम नादान लोग भला क्योंकर तेरा जाप कर सकते हैं, तुम बहुत बड़े हो, अगम्य एवं असीम हो।

30हे प्रभु! हमें उत्तम बुद्धि प्रदान करो और गुरु के चरणों में लगा दो।

31हमें सत्संगति में मिला दो, हम पापियों को संगत द्वारा पार उतार दो।

32हे प्रभु! दास नानक को क्षमा कर दो, तेरी खुशी में मिलाप होता है।

33हे हरि ! हमारी विनती सुनो, कृपा करके हम पापी कीटों को पार उतार दो॥ १॥

34महला ४॥

35हे श्री हरि ! दया करके गुरु से मिला दो।

36गुरु की सेवा ही हमें अच्छी लगती है, प्रभु कृपालु हो गया है,

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं