गुरु ग्रंथ साहिब 1311 · Raag Kaanraa · Guru Raam Daas Ji
1ईश्वर की नगरी में सत्य, संतोष, धर्म इत्यादि शुभ गुणों को टिकाया गया हैं और वहाँ परमात्मा का गुणगान होता है।॥ ३॥
2जब प्राणी मोह के कीचड़ में गिरता है तो गुरु उसे निकाल लेता है।
3‘बचाओ-बचाओ' की प्रार्थना करते हुए जीव शरण में आते हैं और गुरु हाथ देकर इनको बचाता है॥ ४॥
4समूचा संसार सपने की बाजी है और प्रभु ही जीवनबाजी का खेल खेलाता है।
5गुरु के उपदेशानुसार हरिनाम संकीर्तन का लाभ प्राप्त करो और प्रभु के दरबार में सम्मान सहित जाओ॥ ५॥
6मनुष्य सब अभिमान में करता और करवाता है और पापों का कोयला जमा करता है।
7जब दुखदायक काल आता है तो जो बोया होता है, वही फल खाना पड़ता है॥ ६॥
8हे सज्जनो ! राम नाम रूपी धन इकठ्ठा करो, इसका उपयोग करने से प्रतिष्ठा प्राप्त होती है।
9नाम धन का जितना उपयोग एवं खर्च करोगे, ईश्वर देता ही रहेगा और किसी चीज की कमी नहीं आती॥ ७॥
10राम नाम रूपी धन हृदय में ही है और यह धन गुरु की शरण में ही प्राप्त होता है।
11नानक का कथन है कि ईश्वर ने दया की है, जिससे सब दुख एवं दारिद्रय दूर हो गए हैं।॥ ८॥ ५॥
12कानड़ा महला ४ ॥
13हे मन ! सतिगुरु की शरण का ध्यान करो,
14ज्यों पारस के स्पर्श से लोहा स्वर्ण हो जाता है, वैसे ही गुरु रूपी पारस से, वैसे ही गुण प्राप्त हो जाते हैं।॥ १॥रहाउ॥
15महापुरुष सतिगुरु ऐसा पारस है, जिसके चरणों में लगने से मनोवांछित फल प्राप्त होते हैं।
16ज्यों गुरु के उपदेश से भक्त प्रहलाद संसार-सागर से पार हो गया, वैसे ही गुरु अपने शिष्यों की लाज रखता है॥ १॥
17सतिगुरु का वचन उत्तम है और गुरु के वचन से अमृत प्राप्त होता है।
18ज्यों सतिगुरु के वचन से ध्यान करके अम्बरीष अमरपद पा गए, हम भी गुरु के वचन से ध्यान कर अमर पद प्राप्त करेंगे॥ २॥
19जिसके मन को सतिगुरु की शरण में रहना अच्छा लगता है, वह हरिनाम अमृत का ही ध्यान करता है।
20सतिगुरु दीनों पर दयालु होता है और प्रभु-मिलन का मार्गदर्शन करता है॥ ३॥
21जो सतिगुरु की शरण में पड़ते हैं, वही स्थित होते हैं और प्रभु उनकी ही रक्षा करने के लिए आता है।
22यदि कोई भक्तों पर निंदा का बाण छोड़ता है तो वह उलटा उसे ही आ लगता है॥ ४॥
23जो परमात्मा की उपासना करते हैं, उनको ही सच्चे दरबार में सम्मान प्राप्त होता है।
24जो गुरु की शिक्षानुसार परमात्मा का मनन करता है, वह उसे गले लगाकर मिला लेता है॥ ५॥
25गुरु के मुख से निकला शब्द ही वेद है और गुरु की प्रसन्नता में नाम-ध्यान होता है।
26हरि की पूजा-अर्चना करते हुए भक्तजन हरि का रूप हो जाते हैं।॥ ६॥
27निरीश्वरवाद व्यक्ति गुरु धारण नहीं करता, ऐसे विमुख को परमात्मा भूलभुलैया में डाले रखता है।
28लोभ रूपी कुत्ते की संगत में माया मनुष्य को मुर्दा पशु की तरह ककाल बनाकर रख देती है॥ ७॥
29परमात्मा का नाम समूचे जगत का उद्धार करने वाला है, अतः अच्छी संगत में प्रभु-नाम का भजन करो।
30नानक विनती करते हैं कि हे मेरे प्रभु ! मुझे संतों की संगत में ही रखो॥ ८॥ ६॥ छः शब्दों का जोड़१॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं