सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 1310 · Raag Kaanraa · Guru Raam Daas Ji

1गुरु की कृपा से अहम्-भाव दूर हो जाए तो गुरु-उपदेशानुसार जीव हरिनाम में समाहित हो जाता है।॥ ६॥

2सतगुरु सब जीवों का दाता है, परन्तु दुर्भाग्यशाली लोगों को अच्छा नहीं लगता।

3मनुष्य जीवन का यह सुनहरी अवसर पुनः हाथ नहीं आता और मनुष्य दुखी होकर पछताता है॥ ७॥

4यदि अपना भला चाहते हो तो गुरु के सन्मुख झुक जाओ।

5नानक विनती करते हैं कि हे ईश्वर ! मुझ पर दया कीजिए, गुरु की चरणरज माथे पर लगाना चाहता हूँ ॥८॥३॥

6कानड़ा महला ४ ॥

7हे मन ! ईश्वर के रंग में लीन होकर उसी का गुणगान करो।

8इससे सब भय एवं चिन्ता दूर हो जाती है, गुरु के उपदेश से निर्मल मन प्रभु की लगन में लीन रहता है॥ १॥रहाउ॥

9ईश्वर के रंग में लीन जीव सदा वैराग्यवान रहता है और परमात्मा उसके ह्रदय घर में ही रहता है।

10यदि ऐसे भक्तों की चरण-धूल मिल जाए तो जीवन बना रहता है और प्रभु कृपा करके स्वयं ही दिलवाता है।॥ १॥

11दुविधा एवं लोभ में लीन प्राणी का मन कोरा ही रहता है और उसे प्रभु-रंग नहीं चढ़ता।

12जब गुरु मिल जाता है तो मन बदल जाता है, गुरु के वचनों से जीव का नया जन्म होता है, फिर उसे प्रभु-भक्ति का रंग लगा रहता है।॥ २॥

13दसों इन्द्रियों दसों दिशाओं में भागती हैं और तीन गुणों के कारण पल भर भी नहीं टिकती।

14जब सतगुरु से साक्षात्कार होता है तो वह वश में आ जाती हैं और मुक्ति प्राप्त हो जाती है॥ ३॥

15केवल ओमकार सम्पूर्ण सृष्टि में व्याप्त है और सब ने उस एक में ही लीन होना है।

16वह एक ही रूप वाला है, अनेक रंगों में विद्यमान है, समूचा संसार उस ‘एक' के ही वचन से चलता है॥ ४॥

17गुरु उस एक अनंतशक्ति को ही मानता है और वही रहस्य को जानता है।

18गुरु के द्वारा जीव अपने सच्चे घट में जा मिलता है और उसके अन्तर्मन में अनहद शब्द गूंजता रहता है।॥ ५॥

19जीव-जन्तु समूची सृष्टि को उत्पन्न करके परमेश्वर ने गुरु को ही शोभा प्रदान की है।

20गुरु के साक्षात्कार बिना ईश्वर प्राप्त नहीं होता, अन्यथा जीव जन्म-मरण के चक्र में दुख पाता है॥ ६॥

21हे मेरे प्रियतम ! हम अनेक जन्मों से बिछुड़े हुए हैं, कृपा करके गुरु से मिला दो।

22सच्चे गुरु को मिलकर परम सुख प्राप्त होता है और मलिन बुद्धि भी खिल उठती है॥ ७॥

23हे परमेश्वर ! कृपा करो और मुझे श्रद्धापूर्वक नाम-कीर्तन में लगा दो।

24नानक का कथन है कि गुरु ही परमेश्वर है, गुरु-परमेश्वर एक रूप हैं और मुझे सच्चे गुरु की शरण में मिला ॥८॥४॥

25कानड़ा महला ४ ॥

26हे मन ! गुरु-उपदेशानुसार जीवन-आचरण अपनाना चाहिए।

27ज्यों मस्त हाथी को अंकुश के नीचे रखा जाता है, वैसे ही गुरु अपने शब्द के अंकुश से चलाता है॥ १॥रहाउ॥

28मन दसों दिशाओं में दोलायमान होता है, लेकिन गुरु इसे रोककर परमात्मा के ध्यान में लगाता है।

29सतिगुरु ह्रदय में शब्द ही देता है और मुख में हरिनाम अमृत डाल देता है॥ १॥

30माया रूपी सांप वासनाओं के जहर से भरा हुआ है और पूर्ण गुरु शब्द रूपी गारुड़ी मंत्र मुख में डालता है।

31तदन्तर माया रूपी सांप उसके निकट नहीं आता और वासना का जहर उतर कर परमात्मा में ध्यान लग जाता है॥ २॥

32लोभ रूपी कुत्ता शरीर रूपी नगर में शक्तिशाली है लेकिन गुरु पल में ही इसे मार कर निकाल देता है।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं