सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 1308 · Raag Kaanraa · Guru Arjan Dev Ji

1वह पूर्ण परमानंद एवं सुखों का घर है, मुक्ति, युक्ति, सब कामनाएँ पूर्ण करने वाला है।

2नानक का कथन है कि हम उसकी भाव-भक्ति से निहाल हैं और सदैव उस पर कुर्बान जाते हैं॥२॥४॥४६॥

3कानड़ा महला ५॥

4लोग परमात्मा की चर्चा करते रहते हैं

5योगाभ्यासी, ध्यानशील, वेषाडम्बरी, ज्ञानवान, भ्रमण करने वाले तथा धरती पर रहने वाले सब ॥१॥रहाउ॥

6कई लोग अभिमान में लीन रहते हैं और कई मूर्ख बावले हुए फिरते हैं।

7वे जहाँ-जहाँ जाते हैं, मृत्यु सदैव बनी रहती है।॥१॥

8मान-अभिमान त्याग दो, मृत्यु सदा पास है।

9परमात्मा का भजन करो, नानक कहते हैं कि अरे मूर्ख ! मेरी बात सुन, भगवान के भजन बिना जीवन व्यर्थ जा रहा है॥२॥५॥५०॥१२॥६२॥

10कानड़ा असटपदीआ महला ४ घरु १

11ੴ सतिगुर प्रसादि॥

12हे मन ! राम नाम का जाप कर लो, इसी से सुख प्राप्त होगा।

13ज्यों-ज्यों जाप करोगे, त्यों-त्यों परम सुख मिलेगा और सतगुरु की सेवा में लीन रहोगे॥१॥रहाउ॥

14भक्तजनों की हर पल हरिनाम जपने की कामना रहती है, इसी से उनको सुख प्राप्त होता है।

15उनको अन्य रसों का स्वाद भूल जाता है और नाम के बिना कुछ भी अच्छा नहीं लगता॥१॥

16गुरु की शिक्षा से हरिनाम ही मीठा लगा है और गुरु मीठे वचन ही बोलता है।

17सतिगुरु की वाणी से पुरुषोत्तम परमेश्वर का ज्ञान मिलता है, अतः गुरु की वाणी से मन लगाओ॥२॥

18गुरु की वाणी सुनकर मेरा मन द्रवित हो गया है और भीगा मन आत्मस्वरूप में आता है।

19वहाँ अनाहत ध्वनि गूंजती है, अमृतधारा बहती है॥३॥

20जो पल भर के लिए राम नाम का भजन गाता है, गुरु की शिक्षा से उसका मन नाम में ही लीन हो जाता है।

21ऐसा जिज्ञासु राम नाम का संकीर्तन सुनता, नाम ही उसके मन को अच्छा लगता है और नाम से ही वह तृप्त होता है।॥४॥

22बेशक स्वर्ण के आभूषण, कंगन एवं सुन्दर वस्त्र धारण कर लो,

23हरिनाम बिना सभी व्यर्थ हैं और पुनः जन्म-मरण का चक्र बना रहता है।॥५॥

24माया का पर्दा बहुत भारी है और यह भूल-भुलैया में डालकर मनुष्य को तबाह करता है।

25पाप-विकारों ने लोहे की तरह भारी कर दिया है, इससे दुस्तर संसार-समुद्र से पार नहीं हुआ जा सकता॥६॥

26ईश्वर के प्रेम एवं वैराग्य भाव को जहाज बना लो, गुरु खेवट अपने शब्द द्वारा संसार-समुद्र से पार करवा देगा।

27राम नाम के चिंतन से प्रभु से साक्षात्कार हो सकता है और राम नाम में लीन हो जाओगे॥७॥

28प्रभु मनुष्य को अज्ञान की निद्रा में उाल देता है, गुरु का ज्ञान ही इससे जगाने वाला है।

29नानक फुरमाते हैं- परमेश्वर की रज़ा शिरोधार्य है, जैसे उसे उचित लगता है, वैसे ही संसार को चलाता है॥८॥१॥

30कानड़ा महला ४॥

31हे मन ! हरिनाम का जाप करो, संसार-समुद्र से तैर जाओगे।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं