गुरु ग्रंथ साहिब 1306 · Raag Kaanraa · Guru Arjan Dev Ji
1प्रभु का भजन पापों की मैल को जला देने वाला है और वह गुरु के साक्षात्कार से ही मिलता है, इसके अतिरिक्त अन्य कोई कारगर उपाय नहीं॥१॥रहाउ॥
2तीर्थ स्नान, अध्ययन, अध्यापन दान देना अथवा लेना इन षट कर्मो, लम्बी जटाएँ धारण करने, होम-यज्ञ और योगियों की तरह दण्ड लिए घूमना, इनका कोई लाभ नहीं॥१॥
3अनेक प्रकार के यत्नों, तपस्या, देश भ्रमण, अनेक बातें करने का कोई फायदा अथवा ठौर नहीं।
4हे नानक ! भलीभांति विश्लेषण करने के पश्चात् यही माना है कि परमात्मा के भजन से ही सच्चा सुख मिलता है।॥२॥२॥३६॥
5कानड़ा महला ५ घरु ९
6ੴ सतिगुर प्रसादि॥
7हे जिज्ञासुओ ! ईश्वर पतित-पापी लोगों को पावन करने वाला है, भक्तवत्सल, सब भय हरण करने वाला एवं मुक्तिप्रदाता है॥१॥रहाउ॥
8उसके दर्शनों से आँखें तृप्त हो जाती हैं और यश सुनने से कान आनंदित हो जाते हैं।॥१॥
9वह हमारे प्राणों का नाथ, दीन-दुखियों, अनाथों का दाता है, शरण देने वाला है।
10गुरु नानक का कथन है कि ईश्वर सब आशाएँ पूरी करने वाला है, दुख-तकलीफ का नाश करने वाला है।अतः उसी के चरणों का आसरा ले लिया है।॥२॥१॥४०॥
11कानड़ा महला ५॥
12मैं दयालु प्रभु के चरणों की शरण में रहता हूँ, अतः अन्य नहीं जाता।
13पतितों को पावन करना स्वामी का स्वभाव है, जो परमात्मा के ध्यान में लीन रहते हैं, उनकी मुक्ति हो जाती है।॥१॥रहाउ॥
14यह संसार-सागर विकारों के कीचड़ से भरा हुआ है, मुझ सरीखा पतित मोह-अभिमान में अंधा बना हुआ है और माया के धंधों से लिप्त रहता है।
15प्रभु स्वयं ही हाथ थामकर निकालने वाला है, हे गोविंद ! मुझे बचा लो॥१॥
16अनाथों का नाथ, भक्तजनों का स्वामी करोड़ों ही पाप दूर करने वाला है।
17मन में उसी के दर्शनों की प्यास बनी हुई है।
18प्रभु गुणों का पूर्ण भण्डार है।
19वह कृपानिधि सदैव दया करने वाला है, संसार का पालक है।
20अतः नानक तो हरदम अपनी जीभ से परमात्मा के गुण गाता है॥२॥२॥४१॥
21कानड़ा महला ५॥
22मैं अनेकों सुख कुर्बान कर दूँ
23अपने पति-प्रभु के रात के थोड़े-से सुहाग-सुख पर॥१॥रहाउ॥
24हे सत्संगी सखी ! मुझे स्वर्ण सरीखा, सुन्दर घर, रेशमी कपड़ों, सुखदायक सेज इत्यादि इन से कोई रुचि नहीं॥१॥
25नानक का कथन है कि परमात्मा के नाम बिना अनेक भोग-विलास एवं हीरे-मोती सब नाशवान हैं।
26हे सखी ! अपने पति-प्रभु के साथ रुखा-सूखा भोजन एवं भूमि पर शयन इत्यादि ही सुखमय है॥२॥३॥४२॥
27कानड़ा महला ५॥
28अभिमान छोड़कर प्रभु-भक्ति में लगन लगाओ।
29गुरु-गुरु जपना ही मन की आकांक्षा बनाओ।
30प्रिय प्रभु से प्रेम प्रीति लगाए रखो॥१॥ रहाउ॥
31कामादिक पाँच दुष्टों से नाता तोड़ लो, इससे हृदय-घर सुहावनी सेज बन जाएगा और मन रूपी आंगन में सुख-शान्ति हो जाएगी॥१॥
32आवागमन मिट जाएगा, अपने मूल घर में निवास बन जाएगा और हृदय रूपी अर्ध कमल विकसित हो जाएगा।
33तुम्हारे अहम् का शोर समाप्त हो जाएगा।
34नानक का कथन है कि हे सत्संगी सखी ! हमने गुणों के गहरे सागर प्रभु का स्तुतिगान किया है॥२॥४॥४३॥
35कानड़ा मः ५ घरु ९॥
36हे मन ! परमात्मा का जाप करो,
37संत-महात्मा जनों एवं वेदों का कथन है कि जीवन-मार्ग बहुत कठिन है, जीव मोह, अभिमान के ताप में ही मगन रहता है, तभी तो जाप करने के लिए कहा है॥रहाउ॥
38जो माया के मोह में लीन रहते हैं, वे दुखी ही रहते हैं।॥१॥
39परमात्मा का नाम जपकर उसी व्यक्ति का उंद्धार होता है, जिसका वह स्वयं उद्धार करता है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं