सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 1305 · Raag Kaanraa

1हे जगत्-गुरु ! नानक को आन मिलो॥२॥१॥३४॥

2कानड़ा महला ५ ॥

3ऐसा कौन-सा तरीका है, जिससे भगवान के दर्शन हो जाएँ॥१॥रहाउ॥

4सब मनोकामनाएँ पूरी करने वाले प्रभु की तीव्र लालसा लगी हुई है और मन उसके दर्शनों की उमंग में तरस रहा है॥१॥

5मैं विनम्रतापूर्वक भक्तजनों की शरण में आया हूँ, प्रभु की प्यास में मछली की तरह तड़प रहा हूँ और

6हरि-भक्तों की चरणधूल का इच्छुक हूँ।

7मैंने अपना हृदय भी अर्पण कर दिया है,

8प्रभु मुझ पर कृपालु हो गया है।

9हे नानक ! यदि मान-मोह को छोड़ दिया जाए तो ही परमात्मा से भेंट होती है॥२॥२॥३५॥

10कानड़ा महला ५ ॥

11हे जिज्ञासुओ ! इस जगत-तमाशे में भगवान अनेक प्रकार के रंगों में विद्यमान है।

12वह कीड़े से लेकर हाथी तक सब में व्याप्त है॥१॥रहाउ॥

13कोई व्रत-उपवास रखता है, कोई नियम धारण करता है, कोई गंगा सहित अनेक तीर्थों में स्नान करता है।

14कोई जल एवं बर्फ को सहता है, कोई भूखा और कोई नंगा ही रहता है।

15कुछ लोग पदमासन लगाकर पूजा-अर्चना करते हैं।

16कई चक्र-कर्म एवं षटांग तिलक करते हैं।

17इन सबके बावजूद सत्संग के बिना भगवान के दर्शन प्राप्त नहीं होते॥१॥

18कोई व्यक्ति हठपूर्वक इन्द्रियों को रोकता है, शीर्षासन लगाता है,

19लेकिन मन में अहंकार का रोग रहता है, वासनाएं दूर नहीं होती।

20मनुष्य काम-क्रोध एवं तृष्णा की अग्नि में जलता है।

21गुरु नानक का कथन है कि जिसे सच्चा गुरु मिल जाता है, वह संसार के बन्धनों से मुक्त हो जाता है॥२॥३॥३६॥

22कानड़ा महला ५ घरु ७

23ੴ सतिगुर प्रसादि॥

24साधुजनों को मिलकर सारी तृष्णा बुझ गई है।

25परमात्मा के गुण गाते-गाते कामादिक पांच चोर भाग गए हैं, स्वाभाविक सुख प्राप्त हुआ है और प्रभु के दर्शनों से प्रेम बना हुआ है।॥१॥रहाउ॥

26हे प्रभु ! तूने मुझ पर जैसा उपकार किया है, मैं वैसा कैसे कर सकता हूँ।

27मैं ह्रदय से तुझ पर कुर्बान जाता हूँ॥१॥

28पहले संतों के चरणों में पड़कर प्रेम लगाकर तेरा ध्यान किया है।

29हे प्रभु ! तेरा वह स्थान कैसा है, जहाँ बैठकर तू जीवों के पोषण का विचार करता है।

30अनेक भक्तजन तेरी कीर्ति करते हैं।

31नानक का कथन है कि जो चाहता था, वही मिल गया है और ठाकुर जी में ही लीन हूँ।

32हे परमेश्वर ! केवल तू ही (दाता) तू ही (पूज्य) तू ही (सर्वस्व) है॥२॥१॥३७॥

33कानड़ा महला ५ घरु ८

34ੴ सतिगुर प्रसादि॥

35मान-अभिमान छोड़ दो, दयालु प्रभु सब देख रहा है। हे मन ! प्रभु-चरणों की धूल बन जाओ॥१॥ रहाउ॥

36संतों का मंत्र है कि ईश्वर का ध्यान करो, यही ज्ञान है॥१॥

37हृदय से प्रभु का स्तुतिगान करो, उसके चरण कमल से प्रीति लगाओ, वह दीनों पर दयालु है।

38हे कृपानिधि ! दया करो,

39नानक हरिनाम दान और

40मोह, भ्रम, अभिमान सब का त्याग मांगता है॥२॥१॥३८॥

41कानड़ा महला ५॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं