सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 1304 · Raag Kaanraa · Guru Arjan Dev Ji

1मूर्ख लोग विषय-विकारों के रस में आसक्त रहते हैं, फिर भला कैसे सुख पा सकते हैं।॥१॥

2काम, क्रोध एवं लोभ में लीन रहना ही जन्म-मरण का मूल कारण है।

3नानक की विनती है कि यह समझ लो कि पतितपावन परमेश्वर की शरण में आने से मुक्ति होती॥२॥१२॥३१॥

4कानड़ा महला ५ ॥

5मैं परमात्मा के मुखमण्डल को निहारता हूँ।

6खोजते-खोजते मैंने हरिनाम रत्न पा लिया है, जिससे मेरी सब चिन्ताएँ दूर हो गई हैं।॥१॥रहाउ॥

7जब से परमात्मा के चरण-कमल को हृदय में धारण किया है,

8दुख-क्लेश दूर हो गया है॥१॥

9मेरा राज्य, धन, परिवार इत्यादि सर्वस्व ईश्वर ही है।

10हे नानक ! साधु-पुरुषों की संगत में ऐसा लाभ पाया है कि जन्म-मरण से मुक्त हो गया हँ॥२॥१३॥३२॥

11कानड़ा महला ५ घरु ५

12ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

13प्रभु की पूजा करो, हरिनाम की आराधना करो,

14गुरु के चरणों में तल्लीन रहो।

15निष्ठापूर्वक मन में ही परमात्मा को पा लो।

16गुरु की कृपा से जगत को जीत लो॥१॥रहाउ॥

17मैंने अनेक प्रकार से पूजा-अर्चना की है, लेकिन पूजा वही है, जो परमात्मा को अच्छी लगती है।

18मिट्टी के पुतले मानव में क्या बल है कि वह कोई कर्म कर सके।

19प्रभु बांह पकड़कर जिस मार्ग पर लगा देता है, जीव उसी में मिल जाता है।॥१॥

20मुझे अन्य कोई आसरा नहीं सूझता, केवल ईश्वर का आसरा ही मेरी आशा है।

21यह दीन क्या प्रार्थना करे,

22जब सब में प्रभु ही व्याप्त है।

23मुझे तो प्रभु के चरणों की मन में प्यास लगी हुई है।

24नानक का कथन है कि हे प्रभु ! मैं तुम्हारा दास कहलाता हूँ और सदैव तुझ पर कुर्बान जाता हूँ॥२॥१॥३३॥

25कानड़ा महला ५ घरु ६

26ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

27हे प्रभु ! तेरा नाम ही संसार का उद्धार करने वाला है।

28हरि का नाम ही नवनिधि एवं सुखों का भण्डार है।

29अनेक रंगों में रंगा हुआ प्रभु अद्वितीय है।

30हे मन ! क्यों मोह-माया में मग्न है।

31आँखों से साधु-पुरुषों के दर्शन करो।

32जिसके भाग्य में लिखा होता है, वही प्रभु को पाता है।॥१॥रहाउ॥|

33मैं साधु-संतों के चरणों की सेवा करता हूँ,

34उनकी चरण-धूल की अभिलाषा करता हूँ, जो पवित्र कर देती है।

35यह अड़सठ तीर्थों में स्नान करने के फल समान है, जो पापों की मैल काट देती है।

36मैं श्वास-श्वास से ईश्वर का ध्यान करता हूँ और उससे विमुख नहीं होता।

37लाखों-करोड़ों कुछ भी साथ नहीं जाता और

38प्रभु का नाम ही अंत में सहायक होता है॥१॥

39मन में केवल निरंकार का मनन करो और

40द्वैतभाव सब त्याग दो।

41हे प्रभु! मैं तेरे कौन-से गुण का वर्णन करूँ,

42मैं तो तेरे एक गुण का भी वर्णन नहीं कर सकता।

43मेरे मन में तेरे दर्शनों की तीव्र लालसा है,

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं