सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 1303 · Raag Kaanraa · Guru Arjan Dev Ji

1जीव अपने पुत्र, पत्नी एवं धन-दौलत में अटका हुआ है और देने वाले दाता को उसने भुला दिया है।

2हे नानक ! मुझे तो केवल सब बन्धन काटने वाले मेरे गुरु पर ही भरोसा है॥२॥६॥२५॥

3कानड़ा महला ५ ॥

4मैंने तुम्हारे भक्तजनों की मदद से विषय-विकारों के दल को कुचल दिया है।

5हे ठाकुर ! तुम्हारा ही आसरा एवं भरोसा है, तुम्हारी शरण में आया हूँ॥१॥रहाउ॥

6तुम्हारे दर्शनों से जन्म-जन्म के बड़े पाप-दोष मिट गए हैं।

7मन में आनंद के उजाले से प्रकाश हो गया है, स्वाभाविक समाधि में लीन हूँ॥१॥

8तुम सर्वशक्तिमान एवं अथाह हो, फिर भला कौन कहता है कि तुम से कुछ नहीं होता।

9नानक विनती करते हैं कि हे कृपा के भण्डार ! तुम्हारे नाम से सब रंग, रूप एवं रस इत्यादि प्राप्त हो गए हैं।॥२॥७॥२६॥

10कानड़ा महला ५ ॥

11डूबते हुए प्राणी को ईश्वर के जाप से ही धैर्य प्राप्त होता है।

12फिर मोह, भ्रम एवं उसके दुखों की पीड़ा समाप्त हो जाती है।॥१॥रहाउ॥

13मैं दिन-रात गुरु के चरणों का स्मरण करता हूँ,

14जिधर देखता हूँ, तुम्हारी शरण पाता हूँ॥१॥

15संतों की कृपा से ईश्वर का गुणगान किया है।

16हे नानक ! गुरु को मिल कर सुख पा लिया है॥२॥८॥२७॥

17कानड़ा महला ५ ॥

18ईश्वर के नाम-स्मरण से मन में सुख प्राप्त होता है।

19अतः साधु-महात्मा जनों के साथ मिलकर भगवान का यश गाना चाहिए॥१॥रहाउ॥

20हे प्रभु ! कृपा करके हृदय में बसे रहो,

21मेरा माथा संतों के चरणों में पड़ा हुआ है।॥१॥

22मन में परब्रह्म का चिंतन करो।

23नानक का कथन है कि गुरु से परमात्मा का यश सुनो॥२॥६॥२८॥

24कानड़ा महला ५ ॥

25मेरे मन में प्रभु के चरण स्पर्श की प्रीति लगी हुई है।

26यह जिह्म हरिनाम भोजन से तृप्त हो गई है और प्रभु के दर्शनों से आँखों को संतोष प्राप्त हुआ है॥१॥रहाउ॥

27कानों में प्रियतम प्रभु का यश भर रहा है, जिसके फलस्वरूप सब पाप-दोष दूर हो गए हैं।

28यह पैर स्वामी की ओर दौड़ते हैं, जो सुख का रास्ता है और यह शरीर संतों के संग खिला रहता है।॥१॥

29अन्य उपायों से थक कर सब छोड़कर पूर्ण अविनाशी प्रभु की शरण ली है।

30हे नानक ! ईश्वर ने अपने सेवक का हाथ थामकर बचा लिया है और अब वह भयानक संसार-सागर में नहीं डूबता॥२॥१०॥२६॥

31कानड़ा महला ५ ॥

32जिनके अन्तर्मन में नष्ट करने वाला कपट चिल्लाता है, कामादिक दुष्ट गर्जता है, ऐसे लोग अनेक बार मृत्यु को प्राप्त होते हैं।॥१॥रहाउ॥

33मैं अभिमान एवं अन्य रसों में लीन हूँ। दुष्टों से प्रेम बनाया हुआ है। हे प्रियतम प्रभु ! तुम देख ही रहे हो कि मैं लाखों गलियों में भटक रहा हूँ॥१॥

34मेरा आचरण व्यवहार बुरा है, मैं अनियमित जीवन बिताता हूँ और ममता के नशे में मस्त होकर क्रोध की अग्नि में जलता रहता हूँ।

35हे परमेश्वर ! तू करुणामय, कृपालु एवं दीनों का हमदर्द है, नानक तेरी शरण में पड़ा है, उद्धार कर दो॥२॥११॥३०॥

36कानड़ा महला ५ ॥

37परमात्मा हमें जीवन, प्राण एवं मान-सम्मान देने वाला है।

38उस दाता प्रभु को भुलाने से हानि ही होती है।॥१॥रहाउ॥

39ईश्वर को त्याग कर अन्य भौतिक पदार्थों में लगने वाले लोग अमृत को फॅककर धूल ही चाटते हैं।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं