गुरु ग्रंथ साहिब 1302 · Raag Kaanraa · Guru Arjan Dev Ji
1लाखों एवं कई करोड़ों में कौन ऐसा व्यक्ति है, जो सबका विचार करता है॥१॥
2दुनिया उसके प्रेम लाल रंग में आश्चर्यचकित हो गई है।
3हे नानक ! संत पुरुषों को ऐसा आनंद प्राप्त होता है, ज्यों गूंगा मिठाई खाकर मुस्कुराहट व्यक्त करता है॥२॥१॥२०॥
4कानड़ा महला ५ ॥
5भक्तजन प्रभु के सिवा किसी अन्य को नहीं जानते।
6कोई ऊँचा हो अथवा नीचा हो, वे सब को समान ही मानते हैं। वे मुँह से प्रभु का भजन करते हैं और मन में उसी का मनन करते हैं।१॥रहाउ॥
7घट घट में सुखों का सागर ईश्वर ही व्याप्त है, वह सब भय नाश करने वाला है, वही मेरे प्राण हैं।
8गुरु ने मुझे ऐसा मंत्र दिया है, जिससे मन में प्रकाश हो गया है और भ्रम नष्ट हो गया है॥१॥
9वह करुणामय, ज्ञान का सागर, अन्तर्यामी हमें कृतार्थ करता रहता है।
10गुरु नानक का कथन है कि परमात्मा से भक्ति दान मांगने के लिए वह आठ प्रहर उसी का यशोगान करता है॥२॥२॥२१॥
11कानड़ा महला ५ ॥
12कहने-कहलवाने वाले तो पता नहीं कितने ही हैं,
13परन्तु ऐसा कोई सेवक विरला ही होता है जो तत्ववेत्ता कहलाता है।॥१॥रहाउ॥
14ऐसे भक्त एक ईश्वर को ही नयनों में बसाकर रखते हैं, उनके लिए कोई दुख नहीं होता अपितु सब सुख ही सुख मानते हैं।
15उनके लिए कोई बुरा नहीं, सब भला ही भला है, वे सदैव विजय प्राप्त करते हैं और जीवन में कभी हार नहीं मानते॥१॥
16उनके लिए कोई गम नहीं, सदा खुशी ही रहती है और भक्ति के आनंद को छोड़कर कुछ भी नहीं लेते।
17हे नानक ! हरि-भक्त हरि की भक्ति में लीन रहता है, वह कहाँ आता और कहाँ भटकता है अर्थात् आवागमन से मुक्त हो जाता है।॥२॥३॥२२॥
18कानड़ा महला ५ ॥
19मेरे हृदय से प्रियतम प्रभु भूल मत जाना,
20मेरा तन मन उसी में लीन है, पर मोहिनी माया भी मुझे मोह रही है॥१॥रहाउ॥
21जिस-जिसके पास अपनी व्यथा बताता हूँ, वही व्यक्ति को माया ने जकड़ा और अटका रखा है,
22यह अनेक प्रकार का एक मायाजाल है, उसकी गांठ छुड़ाई नहीं जा सकती॥१॥
23दास नानक भटक-भटक कर संत पुरुषों की शरण में आया है।
24उन्होंने मेरे अज्ञान, भ्रम, मोह-माया का जाल काटकर गले लगा लिया है॥२॥४॥२३॥
25कानड़ा महला ५ ॥
26हमारे यहाँ आनंद, खुशियाँ एवं हर्षोल्लास बन गया है।
27हम हरिनाम का गुण-गान करते हैं, नाम का ही ध्यान-मनन करते हैं और हरिनाम ही हमारे प्राणों का आधार है॥१॥रहाउ॥
28हरिनाम ही हमारा ज्ञान एवं स्नान है, हरिनाम का मनन हमारे सब कार्य सम्पन्न करता है।
29हरिनाम से ही शोभा एवं कीर्ति प्राप्त होती है, हरिनाम भयानक संसार-समुद्र से तारने वाला है।॥१॥
30यह अगम्य, अमूल्य हरिनाम रूपी पदार्थ गुरु के चरणों में प्राप्त हुआ है।
31हे नानक ! प्रभु की कृपा हुई तो हृदय में उसके दर्शन करके अन्तर्मन उसी में मग्न हो गया।॥२॥५॥२४॥
32कानड़ा महला ५ ॥
33हमारा सज्जन, मित्र, स्वामी निकट ही है।
34वह सबके साथ रहकर देखता एवं सुनता है, फिर छोटे से जीवन में भला क्यों बुरे काम करते हो॥१॥रहाउ॥
35हरिनाम स्मरण के बिना जितना भी दुनिया के रंगों में लिपटते हो, इनमें से कुछ भी तेरा नहीं।
36आगे परलोक में किए सब कर्म प्रगट हो जाते हैं, क्यों भ्रम के अंधेरे में यहाँ मोहित हो॥१॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं