गुरु ग्रंथ साहिब 129 · Raag Maajh · Guru Amar Daas Ji
1वह दिन-रात सत्य नाम के प्रेम में अनुरक्त रहते हैं और भगवान के सागर में बसेरा कर लेते हैं।॥५॥
2मनमुख पाखंडी बगुले की तरह हमेशा मैला रहता है, जिसके मन को अहंकार की मैल लगी हुई है।
3वह तीर्थों पर स्नान करता है परन्तु उसके अहंकार की मैल दूर नहीं होती।
4उसकी अहंकार की मैल तभी दूर हो सकती है, यदि वह गुरु-शब्द का चिंतन करे और नम्रतापूर्वक जीवन व्यतीत करे॥६॥
5अपनी आत्मा में ही हरि नाम रूपी अमूल्य रत्न पदार्थ पा लिया,
6जब पूर्ण सतिगुरु ने उसे अपना शब्द सुनाया।
7गुरु की दया से उसके मन में से अज्ञानता का अंधकार मिट गया है। उसके हृदय में ज्योति का प्रकाश हो गया है और उसने स्वयं ही अपने स्वरूप को पहचान लिया है॥७॥
8प्रभु ने स्वयं ही जीवों की रचना की है और स्वयं ही अपनी रचना की देखभाल करता है।
9जो मनुष्य सतिगुरु की सेवा करता है, वह प्रभु के दरबार में स्वीकार हो जाता है।
10हे नानक ! जिसके हृदय में प्रभु का नाम निवास करता है, गुरु की कृपा से वह प्रभु को प्राप्त कर लेता है। ॥८॥३१॥३२॥
11माझ महला ३ ॥
12सम्पूर्ण संसार मोह-माया में लिप्त है।
13त्रिगुणी प्राणी माया में मोहित हुए दिखाई देते हैं।
14गुरु की कृपा से कोई विरला पुरुष ही सत्य का बोध करता है और अपनी वृत्ति सहज ही चतुर्थ अवस्था में लगाता है॥ १॥
15मैं उन पर तन-मन से कुर्बान हूँ जो गुरु की वाणी से मोह-माया की तृष्णा को जला देते हैं।
16जो प्राणी मोह-माया की तृष्णा को जला देता है और अपना मन हरि-प्रभु से लगाता है, वह हरि के दरबार में बड़ी शोभा पाता है॥ १॥ रहाउ॥
17देवी-देवताओं का मूल माया है,
18जिन्होंने स्मृतियों एवं शास्त्रों को उत्पन्न किया है।
19इस संसार में काम, क्रोध प्रवृत्त है, इसलिए प्राणी आवागमन के चक्र में पड़कर जन्मता-मरता एवं कष्ट सहन करता है॥ २॥
20भगवान ने मानव शरीर में एक ज्ञान रूपी रत्न डाल दिया है,
21जिसे गुरु की कृपा से हृदय में बसाया जाता है।
22वे ब्रह्मचार्य, जितेन्द्रिय, संयम धारण करके सत्य की भक्ति करते हैं परन्तु पूर्ण गुरु की दया से नाम का स्मरण प्राप्त होता है॥३॥
23जो जीव-स्त्री अपने पीहर (मृत्युलोक) में भ्रम में पड़कर कुमार्ग लगी हुई है।
24द्वैतभाव में फँसी हुई वह अन्तः पश्चाताप करती है।
25वह अपना लोक तथा परलोक दोनों ही गंवा देती है और स्वप्न में भी उसको सुख नहीं मिलता॥ ४ ॥
26जो जीव-स्त्री इहलोक में अपने पति-परमेश्वर को स्मरण करती है,
27गुरु की कृपा से वह पति-परमेश्वर के निकट ही दर्शन करती है।
28वह सहज ही अपने प्रियतम के प्रेम में मग्न रहती है और उसकी वाणी को अपना हार-श्रृंगार बनाती है॥ ५॥
29उनका ही जन्म सफल है जिन्होंने सतिगुरु को पाया है।
30गुरु के शब्द द्वारा उन्होंने माया-मोह को जला दिया है।
31सत्संग में सम्मिलित होकर वह एक ईश्वर का यशोगान करते हैं जो सबके हृदय में व्यापक है॥ ६ ॥
32जो मनुष्य सतिगुरु की सेवा नहीं करता, वह संसार में क्यों आया है?
33उसके जीवन को धिक्कार है। उसने अपना अनमोल मनुष्य जीवन व्यर्थ ही गंवाया है।
34मनमुख नाम का सुमिरन नहीं करता। हरि नाम के बिना वह बहुत कष्ट सहन करता है॥ ७॥
35जिस प्रभु ने इस सृष्टि की रचना की है, वह इस बारे सबकुछ जानता है।
36प्रभु उनको अपने साथ मिला लेता है जो गुरु-शब्द को सदैव अपने नेत्रों में रखता है।
37हे नानक ! नाम उन्हें ही मिलता है, जिनके मस्तक पर सुकर्मों के कारण आदि से ही भाग्य रेखाएँ विद्यमान हैं ।। ८ । १ । ३२ ॥ ३३ ।।
38माझ महला ४ ॥
39हे ईश्वर ! तुम ही आदिपुरुष, अपरम्पार एवं सर्वज्ञ हो।
40वह स्वयं ही सृष्टि की रचना करता है और स्वयं ही प्रलय करके सृष्टि का विनाश भी करता है।
41सबके भीतर एक ईश्वर ही व्यापक है। इस प्रकार अनुभव करके गुरमुख प्रभु के दरबार में बड़ी शोभा पाते हैं।॥ १ ॥
42मैं तन-मन से उन पर बलिहारी हूँ, जो निरंकार परमात्मा के नाम का ध्यान करते हैं।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं