गुरु ग्रंथ साहिब 1297 · Raag Kaanraa · Guru Raam Daas Ji
1हे प्रभु ! तुम बड़े हो, बहुत बड़े हो, महान् हो, जो तुझे ठीक लगता है, वही करते हो।
2नानक का कथन है कि गुरु के उपदेश से हरिनाम अमृत पान किया है, ऐसा गुरु धन्य है, पूजनीय एवं प्रशंसा के लायक है॥२॥२॥८॥
3कानड़ा महला ४ ॥
4हे मन ! राम का भजन करो,
5उसका कोई रूप अथवा आकार नहीं, वही बड़ा है।
6सत्संगति में मिलकर राम का भजन करो,
7भाग्यशाली हो जाओ ॥१॥ रहाउ।॥
8जिस घर में परमात्मा का यशोगान होता है, वहाँ आनंद ही आनंद बना रहता है।
9अतः राम ही राम भजते रहो। गुरु के उपदेश से प्रियतम प्रभु के गुण गाओ, सुख ही सुख उपलब्ध होता है, अतः भगवान का भजन करते रहो॥ ५ ॥
10हे हरि! तुम समूची सृष्टि के रचयिता हो, कृपा का घर हो, हे राम तू ही सब कुछ है।
11नानक की विनती है कि हे प्रभु ! शरण प्रदान करो, गुरु-मतानुसार राम नाम का भजन करता रहूँ २॥३॥९ ॥
12कानड़ा महला ४ ॥
13मैं गुरु के पैरों को चूमता हूँ,
14जिससे प्रभु मिलन का रास्ता प्राप्त होता है।
15खूब मजे लेकर भगवान का भजन करो,
16भाग्य में लिखा है तो प्रभु का प्रेम से कीर्तन करो॥१॥रहाउ॥
17छः कर्मो और बहुत सारे कर्मकाण्डों का सिद्ध-साधक, योगियों ने विस्तार किया हुआ है और अपनी जटाएं बढ़ा रखी हैं।किसी वेषाडम्बर से परमात्मा प्राप्त नहीं होता।
18परमात्मा की प्राप्ति सत्संगत एवं गुरु के उपदेश से ही होती है, चूंकि गुरु संतजन मन के कपाट को खोलकर ब्रहा का भेद बतलाते हैं॥१॥
19हे स्वामी ! तू अपरंपार है, असीम है, तू सबमें भरपूर है।जल-थल हर स्थान पर एक परमेश्वर ही व्याप्त है।
20तू अन्तर्यामी है, सर्वज्ञाता है। दास नानक का प्रभु घट-घट में व्याप्त है॥२॥४॥१०॥
21कानड़ा महला ४ ॥
22हे मन ! ईश्वर का भजन करो,
23वह अगम्य अथाह है।
24गुरु की शिक्षा से प्रभु प्राप्त हो जाता है,
25विधाता ने प्रारम्भ से ऐसा भाग्य लिखा होता है।॥१॥रहाउ॥
26मनुष्य धन-दौलत के जहर को इकठ्ठा करने के लिए बहुत विकार सोचता है, लेकिन परम सुख संतों की संगत में परमात्मा का भजन करने से ही प्राप्त होता है, अतः गुरु की साधना करो।
27जैसे पारस को छू कर लोहा सोना बन जाता है, वैसे ही अच्छी संगत में पापी भी शुद्ध हो जाते हैं, गुरु-मतानुसार अभ्यास करो॥१॥
28ज्यों लकड़ी के साथ लोहा पार हो जाता है, वैसे ही पापी व्यक्ति साधुओं की संगत में पार हो जाते हैं, अतः गुरु की सेवा करो।
29चार वर्णो अथवा चार आश्रमों में से जो भी कोई गुरु को मिलता है, गुरु नानक का वचन है कि वह स्वयं तो भवजल से पार उतरता ही है, अपनी वंशावलि को भी तिरा देता है॥२॥५॥११॥
30कानड़ा महला ४ ॥
31हे भक्तजनो ! भगवान का यश गाओ,
32हरि-यश गाने से पाप दूर हो जाते हैं।
33गुरु-मतानुसार कानों से हरि का यश सुनो,
34हरि कृपा करने वाला है॥१॥रहाउ॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं