गुरु ग्रंथ साहिब 1296 · Raag Kaanraa · Guru Raam Daas Ji
1ईश्वर के भक्तजन भले हैं, जिनको मिलकर मन प्रभु के रंग में रंगीन हो जाता है।
2ऐसा प्रभु-रंग कभी नहीं उतरता और जीव प्रभु के प्रेम में प्रभु से मिल जाता है॥३॥
3हम जैसे अपराधियों ने अनेक पाप किए हैं, पर गुरु ने सब पाप-दोष काट दिए हैं।
4हे नानक ! पतितों को पावन करने के लिए गुरु हरिनाम रूपी औषधि ही देता है॥४॥५॥
5कानड़ा महला ४ ॥
6हे मन ! जगत के मालिक परमेश्वर का भजन कर लो,
7हम विषय-विकारों के भैंवर में पड़े हुए थे, लेकिन सतिगुरु ने हाथ देकर बाहर निकाल लिया है॥१॥रहाउ ॥
8हे नारायण ! तू हमारा स्वामी है, अभय है, मोह-माया की कालिमा से परे है, कृपा करके हम पापी पत्थरों को तुम बचा लो।
9हम काम-क्रोध, विषय-विकारों एवं लोभ में मगन थे, ज्यों लोहा लकड़ी के साथ पार हो जाता है, यूँ ही हमें पार उतार दो॥१॥
10हे हरि ! तुम महान् हो, सर्वशक्तिमान हो, ज्ञानेन्द्रियों से परे हो, हम तुझे ढूंढते रहे, पर तेरा साथ नहीं पा सके।
11तू परे से परे है, अपरंपार है, हमारा स्वामी है, पूरे जगत का मालिक है, तू अपनी महानता स्वयं ही जानता है॥२॥
12जब अदृश्य, मन-वाणी से परे मानकर नाम का ध्यान किया तो सत्संगत में सन्मार्ग मिल गया।
13सच्ची संगत में हरि कथा सुनी, अकथनीय कथा का आनंद प्राप्त किया, हरि का भजन किया॥३॥
14हे जगदीश्वर, जगत-पालक, जगन्नाथ प्रभु ! हमारी रक्षा करो।
15नानक दासों के दासों का भी दास है, हे प्रभु ! कृपा करके अपने भक्तों के साथ रख लो॥४॥६॥
16कानड़ा महला ४ पड़ताल घरु ५ ॥
17ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
18हे मन ! परमात्मा का जाप करो।
19हरिनाम ही रत्न, जवाहर एवं माणिक्य है।
20गुरु की टकसाल में हरिनाम बनता है।
21जब कृपालु होता है तो प्राप्त हो जाता है॥१॥रहाउ॥
22हे प्रभु ! तुम्हारे गुण बे-अन्त हैं, ज्ञानेन्द्रियों की पहुँच से परे हैं, मेरी एक जीभ बेचारी कैसे कथन कर सकती है।
23तुम्हारी कथा अकथनीय है, जिसे केवल तू ही जानता है। मैं हरिनाम का भजन करके निहाल हो गया हूँ॥१॥
24ईश्वर ही हमारा प्राण-सखा है, वही हमारा स्वामी एवं परम मित्र है, मेरे मन, तन, जीभ में वही अवस्थित है और हर समय उसी का नाम जपता हूँ, वही हमारी धन-दौलत है।
25जिसका उत्तम भाग्य होता है, उसे ही पति-प्रभु मिलता है और गुरु के उपदेश से वह परमात्मा का गुण-गान करता है। हे नानक ! मैं उस पर कुर्बान जाता हूँ, और ईश्वर का जाप कर निहाल हो गया हूँ॥२॥१॥७॥
26कानड़ा महला ४ ॥
27ईश्वर के गुण गाओ,
28एक जिव्हा को बिस लाख बनाकर
29परमात्मा का जाप करो, यही शब्द जपने योग्य है।
30प्रभु की कृपा सदैव बनी रहेगी॥१॥रहाउ॥
31ईश्वर ने कृपा करके हमें अपनी सेवा में लगा लिया है, अब तो हर वक्त उसका नाम जप-जपकर आनंद मना रहे हैं।
32हे राम ! तुम्हारे भक्त नित्य तुम्हारा नाम जपते हैं, उन उत्तम लोगों पर सर्वदा कुर्बान जाता हूँ॥१॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं