सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 1295 · Raag Kaanraa · Guru Raam Daas Ji

1मैं भक्तों की महिमा वर्णन नहीं कर सकता, क्योंकि परमात्मा ने उनको उत्तम बना दिया है॥३॥

2हे प्रभु ! एकमात्र तुम ही बड़े सौदागर हो, हम व्यापारियों को तुम ही राशि देते हो।

3नानक विनती करते हैं कि है प्रभु ! दया करो, हम नाम का सौदा लाद कर ले जाएँ॥४॥२॥

4कानड़ा महला ४ ॥

5हे मन ! प्रकाश स्वरूप राम नाम का जाप करो,

6प्रभु के भक्तों के साथ मिलकर प्रेम लगाओ और गृहस्थ जीवन में मोह-माया से विरक्त रहो॥१॥रहाउ॥

7हमने हृदय में प्रभु का नाम जपा, तो कृपालु प्रभु ने कृपा कर दी।

8हर दिन आनंद ही आनंद हो गया है, मन खिल गया है, अब तो प्रभु मिलन की लालसा लगी हुई है॥१॥

9हमने जितनी साँसे ली, भोजन किया, उतना ही प्रभु से प्रेम लगाए रखा।

10पल भर में सब पाप नष्ट हो गए और माया का फंदा टूट गया॥२॥

11हम क्या कीट समान जीव हैं और क्या कर्म करते हैं, हम जैसे मूर्ख गंवारों की तो भी प्रभु रक्षा करता है।

12हम अवगुणों से भरे हुए भारी पत्थर समान हैं, जो सत्संगति में मिलकर ही संसार-सागर से तैर सकते हैं।॥३॥

13जगदीश्वर ने जितनी भी सृष्टि बनाई है, सब ऊँचे हैं और हम नीच विषय-विकारों में प्रवृत्त हैं।

14हे नानक ! जब गुरु मिलता है तो हमारे सब अवगुण मिट जाते हैं और वह प्रभु से मिला देता है॥४॥३॥

15कानड़ा महला ४ ॥

16हे मेरे मन ! गुरु के वचनानुसार राम नाम का जाप किया।

17जगदीश्वर हरि ने मुझ पर कृपा की है, जिससे दुर्मति एवं द्वैतभाव सब दूर हो गया है॥१॥रहाउ॥

18परमात्मा के अनेक रूप रंग हैं, वह घट घट में अदृष्ट रूप में व्याप्त है।

19यदि परमात्मा के भक्तों से मिलाप हो जाए तो वह प्रभु प्रगट हो जाता है और विषय-विकारों के द्वार खुल जाते हैं।॥१॥

20भक्तजनों की बहुत शोभा है, जिन्होंने प्रेम से प्रभु को हृदय में धारण किया हुआ है।

21जैसे गाय को देखकर बछड़ा आ मिलता है, वैसे ही परमात्मा के भक्तों से मिलकर परमात्मा मिल जाता है॥२॥

22प्रभु तो भक्तजनों में ही रहता है और प्रभु के भक्त सब लोगों से उत्तम एवं भले हैं।

23उनके हृदय में ऐसी खुशबू होती है कि सब दुर्गन्धियां दूर हो जाती हैं।॥३॥

24हे प्रभु! हम तुम्हारे सेवक हैं, तुमने ही बनाया है, अपना बनाकर हमें बचा लो।

25दास नानक का कथन है कि प्रभु ही हमारा मित्र, भाई, माता-पिता, बंधु एवं संबंधी है॥४॥४॥

26कानड़ा महला ४ ॥

27हे मेरे मन ! एकाग्रचित होकर परमात्मा के नाम का मनन करो।

28हरिनाम रूपी वस्तु माया के किले में विद्यमान है, गुरु के उपदेश द्वारा इस किले को जीत लो १॥रहाउ॥

29मैं झूठे भ्रम में भटकता रहा, पुत्र-पत्नी के मोह-प्रेम में ही तल्लीन रहा।

30जैसे पेड़ की तुच्छ छाया समाप्त हो जाती है, वैसे ही शरीर रूपी दीवार पल में नाश हो जाती है॥१॥

31ऐसे उत्तम भक्त हमें प्राणों से भी प्यारे हैं, जिनको मिलकर मन में निष्ठा उत्पन्न होती है।

32प्रभु अन्तर्मन में व्याप्त है, इनकी संगत में प्रभु से प्रेम दृढ़ हो जाता है।॥२॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं