सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 1293 · Raag Malaar

1मलार बाणी भगत रविदास जी की

2ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

3हे नगर के लोगो ! यह बात विख्यात है कि मेरी जाति चमार है (जिसको आप छोटा मानते हो, परन्तु)

4मेरे हृदय में परमात्मा ही बसा हुआ है, उसी के गुण गाता हूँ॥१॥रहाउ॥

5गंगाजल से तैयार की हुई शराब भक्तजन पान नहीं करते।

6मगर अपवित्र शराब एवं चाहे दूषित पानी भी हो, वे गंगा में मिलकर उससे अलग नहीं होते बल्कि गंगा ही हो जाते हैं।॥१॥

7ताड़ के पेड़ को अपवित्र माना जाता है, उसी पेड़ से कागज बनकर आता है।

8तदन्तर जब भगवान की भक्ति-स्तुति उस पर लिख दी जाती है तो वह पूजनीय बन जाता है और लोग उस पर शीश निवाते हैं।॥२॥

9मेरी जाति के लोग अभी भी बनारस के आस-पास नित्य मृत पशु ढोते हैं।

10रविदास कहते हैं कि हे परमात्मा ! तेरे नाम एवं शरण के कारण अब बड़े-बड़े ब्राहाण हमें दण्डवत प्रणाम कर रहे हैं।॥३॥१॥

11मलार ॥

12जो श्रीहरि का जाप करते हैं, उसके चरणों की पूजा करते हैं, ऐसे भक्तों के समान अन्य कोई नहीं।

13वह एक ही है और एक वही अनेक रूपों में फैला हुआ है, उसी को दिल में बसाओ॥रहाउ॥

14जिसके घर में भगवान का भजन होता है, अन्य कुछ दिखाई नहीं देता, उस नामदेव की जाति छींबा अछूत है।

15व्यास की रचना तथा सनक की रचनाओं में हरिनाम की कीर्ति है, जो सातों द्वीपों में फैली हुई है॥१॥

16जिसके जहाँ ईद-बकरीद के त्यौहारों पर गो-वध होता था, शेखों एवं पीरों को.मानते थे,

17जिसका पिता यह सब करता था, उसके पुत्र ने वह कर दिया कि वह कबीर दुनिया भर में प्रसिद्ध हो गया॥२॥

18जिसके परिवार के वंशज अब भी बनारस के आसपास पशु ढोते हैं,

19दासों के दास रविदास को ब्राह्मण समाज आदरपूर्वक दण्डवत प्रणाम करता है॥३॥२॥

20मलार

21ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

22प्राणों से प्यारा प्रभु किस भक्ति से मिलता है और

23साधु जनों की संगत में परमगति संभव है॥२॥रहाउ॥

24पराई निंदा द्वारा मैले कपड़े कहाँ तक धोऊँगा।

25नींद आएगी तो कहाँ सो सकूंगा Il १॥

26जो जो कुटिल कर्म करके लेखा-जोखा इकठ्ठा किया था, वह हिसाब फट गया है।

27झूठे व्यापार की दुकान बंद ही हो गई है॥२॥

28रविदास जी कहते हैं कि जब कर्मों का हिसाब होता है तो

29जो-जो शुभाशुभ कर्म किया होता है, वही दिखाई देता है॥३॥१॥३॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं