सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 1292 · Raag Malaar

1रागु मलार बाणी भगत नामदेव जीउ की ॥

2ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

3सृष्टि पालक, कुलातीत, माया की कालिमा से रहित प्रभु की उपासना करो।

4भक्तजन भक्ति का दान चाहते हैं, हे भक्तवत्सल ! अपनी भक्ति दीजिए॥१॥॥ रहाउ ॥

5उसके घर में दस दिशाओं का शामियाना फैला हुआ है, समूचा वैकुण्ठ उसकी चित्रशाला है और वह समूचे विश्व में समान रूप से व्याप्त है।

6उसके घर में नवयुवती लक्ष्मी रह रही है, चाँद और सूर्य संसार को रोशनी देने वाले दीपक हैं। काल रूपी कोतवाल जिससे सब लोग डरते हैं, वह बेचारा उसके सामने कुछ भी नहीं।

7सो समूचे विश्व का राजा श्रीहरि पूज्य एवं वंदनीय है॥१॥

8उसके घर में चार मुखों वाला ब्रह्मा रूपी सर्जक है, जो पूरे विश्व एवं लोगों को बनाने वाला है।

9उसके घर में जगदगुरु शिवशंकर है, जो मौत का ज्ञान देता है।

10उसके द्वार में पाप-पुण्य कर्मों का हिसाब करने वाला छोटा-सा मुनीम चित्रगुप्त भी बैठा हुआ है और

11मौत लाने वाला यमराज रूपी दरबान भी है।

12संसार का पालनहार ऐसा राजा ही बड़ा है, पूजनीय है॥२॥

13उस घर पर गण-गंधर्व, ऋषि एवं वादक ईश्वर का यश गा रहे हैं।

14सब शास्त्र स्वांग भर रहे हैं अर्थात् शास्त्रानुसार लोग कर्मकाण्ड कर रहे हैं, दुनिया छोटा-सा अखाड़ा है, दुनिया के लोग उसी के गुण गा रहे हैं।

15उसके घर में चंवर रूप में वायु बह रही है,

16उसकी दासी माया ने समूचे संसार को जीत लिया है,

17पृथ्वी-नभ उसका चूल्हा है।

18सो तीनों लोकों का स्वामी प्रभु महान् है॥३॥

19उसके घर में विष्णुवतार कूर्म पलंग समान है, हजार फनों वाला शेषनाग सेज की रस्सियां हैं।

20अठारह भार वाली वनस्पति मालिन है, छियान्वे करोड़ मेघमाला उसका पानी भरने वाले हैं।

21गंगा उसके नाखुनों का रक्त मात्र है,

22सात समुद्र घड़थली है।

23दुनिया के सब जीव उसके बर्तन हैं।

24सो तीनों लोकों का मालिक वह राजा प्रभु महान् है॥४॥

25अर्जुन, भक्त धुव, प्रहलाद, अंबरीक, नारद, सिद्ध, बुद्ध, गण-गंधर्व उसके सेवक हैं।

26उसके घर में अनगिनत जीव हैं।

27वह हरि सर्वव्यापक है।

28नामदेव विनती करते हैं कि हम उस परमेश्वर की शरण में हैं और

29सब भक्तजन उसकी कीर्ति बताने वाले चिन्ह हैं।॥५॥१॥

30मलार ॥

31हे ईश्वर ! तुम मुझे मत भुलाओ, मुझे न भूलना,

32मुझे हरगिज न भुलाना॥१॥रहाउ॥

33इन पण्डितों को अपनी ऊँची जाति का भ्रम है, जिसकी वजह से मुझ पर सभी गुस्सा हो गए हैं।

34शूद्र-शूद्र कह कर उन्होंने मारपीट कर मुझे मन्दिर से बाहर निकाल फॅका है। हे मेरे पिता प्रभु ! इनके आगे मैं अकेला क्या कर सकता हूँ॥१॥

35यदि तूने मुझे मरने के बाद मुक्ति दे दी तो तेरी दी हुई मुक्ति का किसी को पता नहीं लगना।

36ये पण्डित मुझे नीच कह रहे हैं, इस से तेरी अपनी प्रतिष्ठा कम हो रही है (क्या तेरी भक्ति करने वाला कोई नीच रह सकता है?)॥२॥

37तू सब पर दयालु है, कृपा का घर कहलाता है, तू ही बाहुबली एवं सर्वशक्तिमान है।

38भक्त नामदेव की प्रार्थना सुनकर ईश्वर ने मन्दिर का मुँह उसकी तरफ कर दिया और पण्डितों की तरफ पीठ कर दी॥३॥२॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं