गुरु ग्रंथ साहिब 1290 · Raag Malaar · Guru Nanak Dev Ji
1जब रात को स्त्री पुरुष का संयोग होता है तो मैथुन क्रिया मांस से ही करते हैं।
2हम मांस से बनते हैं, मांस से जन्म लेते हैं और मांस के ही हम शरीर हैं।
3पण्डित जी ! आप स्वयं को चतुर कहला रहे हो, लेकिन ज्ञान-ध्यान की आपको कोई सूझ-बूझ नहीं।
4बाहर के मांस (जीव) को बुरा मानता है और घर का मांस (पत्नी-बच्चे) अच्छा लगता है।
5जीव-जन्तु सब मांस से उत्पन्न होते हैं और प्राण भी शरीर रूपी मांस में स्थित हैं।
6जिनका गुरु अन्धा होता है, वे मेहनत का खाना छोड़कर हराम का खाते हैं।
7हम मांस के शरीर रूपी बर्तन हैं, मांस (पिता के वीर्य) से बनते हैं और मांस (माँ के पेट से) से ही हमारा जन्म होता है।
8पण्डित जी ! आप स्वयं को चतुर कहला रहे हो, पर ज्ञान-ध्यान की कोई सूझ नहीं।
9पुराणों एवं कुरान में भी मांस का ही जिक्र है और चारों युग मांस का ही आचरण है।
10यज्ञ कार्य एवं विवाह-शादी पर भी मांस है, क्योंकि यज्ञ में आहूति बलि और विवाह में कन्या को लाया जाता है।
11कितने ही स्त्री-पुरुष, बादशाह एवं सुलतान इत्यादि मांस से ही पैदा होते हैं।
12यदि ऐसे लोग नरक में जाते दिखाई देते हैं तो आपको उनका दान नहीं लेना चाहिए।
13यह तो सरासर नाइंसाफी है कि दान देने वाला नरक में जाता है और लेने वाला (पण्डित ब्राह्मण) स्वर्ग का हकदार बनता है।
14वाह, पण्डित जी ! वाह !! कितने बुद्धिमान एवं भले बन रहे हो, स्वयं तो समझते नहीं, परन्तु लोगों को उपदेश दे रहे हो।
15अरे पण्डित ! तू जानता ही नहीं कि मांस कहाँ से उत्पन्न होता है।
16पानी से अन्न, गन्ना कपास होता है और तीनों लोकों की रचना भी पानी से ही हुई है।
17यदि यह कहा जाए कि पानी अनेक प्रकार से अच्छा है तो पानी में भी बहुत विकार हैं और अपना रूप बदल कर अनेक प्रकार के रस बन जाता है।
18अतः सब पदार्थ छोड़कर ही पण्डित वैष्णव अथवा सन्यासी कहलाने का हकदार हो सकता है। नानक सब पाखण्ड एवं आडम्बरों को छोड़कर यही बात बताता है॥२॥
19पउड़ी॥
20हे सृष्टिकर्ता ! मैं किस प्रकार तेरी महिमा वर्णन करूँ, दरअसल मेरी एक ही जीभ है, तेरा रहस्य कोई नहीं पा सका।
21जिसने सच्चे शब्द का मनन किया है, वह तुझ में ही समाहित हो गया है।
22कई लोग भगवा वेष धारण करके भ्रमण करते हैं परन्तु सच्चे गुरु के बिना किसी ने भी ईश्वर को नहीं पाया।
23वे देश-देशांतर अमण करके थक गए हैं लेकिन ये नहीं जानते तू अन्तर्मन में गुप्त रूप से व्याप्त है।
24गुरु का शब्द अमूल्य रत्न है, इसका आलोक करके स्वयं ही दिखाया है।
25कोई गुरु की शिक्षानुसार आत्म-ज्ञान को पहचान कर सत्य में ही विलीन हो गया है।
26कई वेषाडम्बरी आडम्बर एवं ढोंग करते हैं, परिणामस्वरूप जन्म-मरण के चक्र में पड़े रहते हैं।
27जिनके मन को परमात्मा अच्छा लगता है, वे एकाग्रचित होकर उस सच्चे प्रभु की प्रशंसा करते हैं।॥२५॥
28श्लोक महला १॥
29गुरु नानक कथन करते हैं कि माया कर्मों का एकमात्र वह वृक्ष है, जिसे सुख रूपी अमृत एवं दुख रूपी जहर का फल लगा हुआ है।
30परमात्मा सर्वकर्ता है, जैसा फल खिलाता है, वैसा ही खाना पड़ता है॥१॥
31महला २॥
32हे नानक ! लोगों की प्रशंसा को आग में जला देना चाहिए।
33इस कमबख्त ने परमात्मा का नाम भुला दिया है और इन में से एक भी साथ नहीं निभाती॥२॥
34पउड़ी॥
35ईश्वर के हुक्म में ही दुनिया चलती है, हर व्यक्ति का कर्मानुसार फैसला होता है।
36हे मालिक ! हमारे कर्मों का फैसला तेरे हाथ है, तू ही मन को प्यारा लगता है।
37मौत हर किसी को साथ ले जाती है, कोई भी जिंदा नहीं बचने वाला।
38सितमगर बुढ़ापा कधे पर चढ़कर नाचता है।
39सच्चा गुरु ही पार करवाने वाला जहाज है और सत्य के रास्ते पर चलने वालों की ईश्वर रक्षा करता है।
40विकारों की आग की ज्वाला जल रही है, जो प्रतिदिन मनुष्य को जलाने में लगी हुई है।
41कर्म-बन्धन में फंसा मनुष्य फल भोग रहा है, और ईश्वर ही मुक्त करता है।
42जो ईश्वर करेगा, वह निश्चय होगा, झूठ का अन्त ही होता है।॥२६॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं